बुधवार, 17 अगस्त 2016

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (द्वि.उ. २५/६) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*पुनि तहां प्रगट होइ रंकारा ।*
*आपु हि आपु अखण्डित धारा ।* 
*तन मन बिसरि जाइ तहां सोई ।*
*रोमहि रोम राम धुनि होई ॥२५॥*
इस अभ्यास से धीरे-धीरे साधक की यह साधना इस कोटि में पहुँच जायगी कि उसे पूरे ‘राम’ नाम के उच्चारण या ध्यान की जरूरत नहीं रहेगी, अपितु उसका स्थान संक्षिप्त रूप ‘र’ ले लेगा । साधक की यह स्थिति आने पर उसे अधिक श्रम नहीं करना पडेगा, बल्कि अनायास ही दिनरात निरन्तर प्रवाह के रूप में इस मन्त्र का मानस जाप होता रहेगा । एक दिन वह साधक इस अखण्डित मन्त्र-धारा में ऐसा बह जायगा कि उसे अपने शरीर और मन की नित्य नैमित्तिक आवश्यकता-पूर्ति की भी परवाह नहीं रहेगी एवं अन्त में उसके रोम-रोम से उस मन्त्र का उच्चारण होता हुआ मालूम पडेगा ॥२५॥
(साधक ‘राम-राम’ की निरंतर अखण्डित ध्वनि गुन्जारते रहने से बाद में उसकी ‘रां रां रां रां’ ऐसी संक्षिप्त आवाज निकलने लगती है, जो शनैः शनैः आगे चल चलक ‘र’ कार बन जाती है – ऐसा श्रीगुरुमुख से सुना है ।)
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*जैसैं पांनी लौंन मिलावै ।*
*ऐसै ध्वनि महिं सुरति समावै ।* 
*राम मन्त्र का इहै प्रकारा ।*
*करै आपु से लगै न बारा ॥२६॥* 
जैसे जल में नमक डाल देने से, कुछ देर बाद, नमक जल में एकमेक हो जाता है, उसी तरह निरन्तर अभ्यास के बाद साधक उस मन्त्र की ध्वनि(‘र’) में ही तन्मय हो जाता है । राम-मन्त्र की साधना की यही विधि है । जो मैंने ऊपर बतला दी है । योगी यदि इसकी साधना में मन लगा दे तो यह मन्त्र, बिना किसी विलम्ब के, शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है ॥२६॥ 
(क्रमशः)

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