卐 सत्यराम सा 卐
दादू कहतां कहतां दिन गये, सुनतां सुनतां जाइ ।
दादू ऐसा को नहीं, कहि सुनि राम समाइ ॥
कहतां सुनतां दिन गये, ह्वै कछू न आवा ।
दादू हरि की भक्ति बिन, प्राणी पछतावा ॥
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साभार ~ Ramgopal Goyal Rotiram
महत्व बुद्धि जिसकी जहाँ, होती " रोटीराम "।
वह व्यक्ति करता वही, अन्य न दूजा काम।।
हाँ ! कुछ दिन रुक जाएगा कुछ दिन दे भी छोड।
पर महत्व बुद्धि उसे, उधर ही देगी मोड।।
कितना भी रोको उसे, समझा या फटकार।
कर्म के दोष गिनाइये, वह नहीं करे विचार।।
हटा नहीं वह पाएगा, उन कामों से टेक।
महत्व बुद्धि ले छीन सब, उसके बुद्धि - विवेक।।
अक्सर जब सत्संगी लोग आपस में चर्चा कर रहे होते हैं, तो उनमें एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से चल पडता है कि, आप इस लाइन में कब से हैं, सब एक दूसरे से पूछ ही लेते हैं । लेकिन जब जबाव सामने निकल कर आते हैं तो, कई बार वे एक दूसरे का चेहरा बडे आश्चर्य से देखते हैं कि, उनमें से कई भाइयों को 15 से 20 - 25 साल तक सत्संग सुनते, कथाऐं श्रवण करते व धाम वास करते - करते हो गए, और करीब 80 % लोग साल के 1 से लेकर 4 महीने तक धामों में रह कर यह सब कर रहे होते हैं, उनको भी आते - जाते 5 से 25 साल हो गए, लेकिन कोई भी उस स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाया, जिसको कि प्राप्त करने को वे यहां आए थे, या आ - जा रहे हैं । जिसकी कि गिनती सच्ची भक्ति में होती है । तो तब वहाँ यह प्रश्न पैदा होता है कि, ऐसा क्यों ? हुआ । पूछने पर सद्संत जवाब देते हैं कि, ऐसा जीव की महत्व बुद्धि की वजह से होता है । ये जो 20 % हैं, इनकी यहां रहते - रहते महत्व बुद्धि ईश्वर से हटकर शरीर में हो जाती है, दो चार साल तक तो सब ठीक चलता है, लेकिन उसके बाद इनके सारे प्रयास धामों की खुली हवा और नदियों के निर्मल जल का सेवन करके शरीर को स्वस्थ रखने तक ही सिमट कर रह जाते है, या फिर बहू बेटों के तानों से बचने तक ।
फिर इनकी प्राथमिकता ईश्वर भक्ति नहीं रह जाती । भक्ति फैले तो कैसे ?
और जो ये 80 % हैं, इनकी महत्व बुद्धि होती तो घर - परिवार और व्यापार में ही है, ये तो सीजन की समाप्ति पर बस picnic मनाने के प्रयोजन से आते हैं, और नौकरी पेशा लोग सरकारी छुट्टियों को cash कराने के लिए । इनकी महत्व बुद्धि जब सत्संग है ही नहीं तो, सत्संग की सीख हृदयस्थ हों तो कैसे ?
भजन तो केवल उसी से होगा, जिसकी महत्व बुद्धि अपने कल्याण में होगी । ज्यादातर तो अपने आप से दुश्मनी ही ठाने होते हैं ।

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