बुधवार, 3 अगस्त 2016

= विरह का अंग =(३/१३४-५)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विरह का अँग ३ =**
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*विरह - विनती*
रोम - रोम रस प्यास है, दादू करहि पुकार ।
राम घटा दल उमंगि कर, बरसहु सिरजनहार ॥१३३॥
विरह पूर्वक दर्शनार्थ विनय कर रहे हैं - राम ! आपके दर्शन - रस की प्यास मेरे रोम २ को लग रही है । सृष्टिकर्ता ! मैं विरही बारंबार प्रार्थना कर रहा हूँ - जैसे बादल समूह की घटा उमंग कर जल वर्षाती है वैसे ही आप मुझ पर प्रसन्न होकर दर्शनानन्द रस वर्षाइये ।
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*विरही - विरह - लक्षण*
प्रीति जु मेरे पीव की, पैठी पिंजर मांहिं ।
रोम - रोम पिव - पिव करे, दादू दूसर नांहिं ॥१३४॥
१३४ - १३५ में विरही और विरह के लक्षण कह रहे हैं - मेरे शरीर पिंजर में प्रियतम प्रभु की प्रीति प्रवेश करके स्थिर हो गई है । मेरा रोम २ पीव २ ही पुकारता है । अब मेरा प्रभु के बिना अन्य लक्ष्य नहीं रहा है ।
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सब घट श्रवणा सुरति सौं, सब घट रसना बैन ।
सब घट नैना ह्वै रहे, दादू विरहा ऐन ॥१३५॥
जिस समय विरही भक्त का संपूर्ण शरीर श्रवण रूप होकर भगवत् का आंतरनाद सुनने के लिए, सुरति रूप होकर ध्यान करने के लिए, रसना रूप होकर भक्ति - रस पान करने के लिए, नेत्र रूप होकर दर्शन के लिए निरंतर तत्पर रहता है, तब ही उसमें विरह का प्रत्यक्ष रूप माना जाता है ।
(क्रमशः)

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