🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏🌷
*https://www.facebook.com/DADUVANI*
*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
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*= ईडवे पधारना =*
तब नरवद ने कहा - स्वामिन् ! यहाँ एक प्रचंड प्रेत रहता है । वह यहां रहने वालों को सबको मार देता है । यदि किसी साधु को उसने मार दिया तो, हमको भी पाप ही लगेगा ।
तब स्वामी दादूदयालुजी ने कहा - यदि तुम हमको नहीं बताते तो तुमको पाप लग सकता था किंतु तुम ने तो हमको बता दिया है, अब तुमको पाप नहीं लग सकता । दूसरे, प्रेत आदि का आघात संतों पर हो भी नहीं सकता । संतों को तो परमात्मा का दृढ़ विश्वास होता है, ऐसा कहकर फिर दादूजी ने यह पद सुनाया -
"दादू मोहि भरोसा मोटा ।
तारण तिरण सोई संग मेरे, कहा करे कलि खोटा ॥टेक॥
दौं १ लागी दरिया तैं न्यारी, दरिया मंझ न जाई ।
मच्छ कच्छ रहैं जल जेते, तिन को काल न खाई ॥१॥
जब सूवे पिंजर घर पाया, बाज रह्या वन मांहीं ।
जिनका समर्थ राखण हारा, तिनको को डर नांहीं ॥२॥
साँचे झूठ न पूजे कबहूँ, सत्य न लागे काई ।
दादू सांचा सहज समाना, फिर वै झूठ विलाई ॥३॥
भगवत् भरोसा दिखा रहे हैं - मुझे भगवान् का भरोसा है, भक्तों को संसार में तारने वाले और स्वयं सब विकारों से तिरे हुये प्रभु मेरे साथ हैं । अतः खोटे कलयुगी प्रेत हमारे आगे क्या करैंगे ? अर्थात् कुछ नहीं कर सकते हैं ।
जैसे समुद्र वा नदी से बाहर वन में अग्नि१ लगा हो, वह समुद्र वा नदी में नहीं जाता है और उनके जल में रहने वाले मत्स्य, कच्छादि को वह अग्नि रूप काल नहीं मार सकता और जैसे शुक पक्षी को घर तथा पिंजरा प्राप्त हो जाता है तब उसका शत्रु बाज पक्षी वन में ही रह जाता है, घर आकर पिंजरे में स्थित शुक पक्षी को नहिं मार सकता है ।
वैसे ही जिन भक्तों का रक्षक समर्थ परमात्मा है, उनको कलियुगी प्रेत और कालादिक कुछ भी भय नहीं होता है । सच्चे की बराबरी झूठा कभी नहीं कर सकता । सच्चा भक्त तो सहज स्वरूप परब्रह्म में समा जाता है और झूठा पुनः संसार में ही विलीन होता है । अतः हमारी तुम कुछ भी चिन्ता मत करो ।
उक्त पद सुनकर नरवद नगर में जाकर संत सेवा संबन्धी कार्यों में लग गये ।
इति श्री दादूचरितामृत विन्दु ८१ समाप्तः ।
(क्रमशः)
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*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
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*= ईडवे पधारना =*
तब नरवद ने कहा - स्वामिन् ! यहाँ एक प्रचंड प्रेत रहता है । वह यहां रहने वालों को सबको मार देता है । यदि किसी साधु को उसने मार दिया तो, हमको भी पाप ही लगेगा ।
तब स्वामी दादूदयालुजी ने कहा - यदि तुम हमको नहीं बताते तो तुमको पाप लग सकता था किंतु तुम ने तो हमको बता दिया है, अब तुमको पाप नहीं लग सकता । दूसरे, प्रेत आदि का आघात संतों पर हो भी नहीं सकता । संतों को तो परमात्मा का दृढ़ विश्वास होता है, ऐसा कहकर फिर दादूजी ने यह पद सुनाया -
"दादू मोहि भरोसा मोटा ।
तारण तिरण सोई संग मेरे, कहा करे कलि खोटा ॥टेक॥
दौं १ लागी दरिया तैं न्यारी, दरिया मंझ न जाई ।
मच्छ कच्छ रहैं जल जेते, तिन को काल न खाई ॥१॥
जब सूवे पिंजर घर पाया, बाज रह्या वन मांहीं ।
जिनका समर्थ राखण हारा, तिनको को डर नांहीं ॥२॥
साँचे झूठ न पूजे कबहूँ, सत्य न लागे काई ।
दादू सांचा सहज समाना, फिर वै झूठ विलाई ॥३॥
भगवत् भरोसा दिखा रहे हैं - मुझे भगवान् का भरोसा है, भक्तों को संसार में तारने वाले और स्वयं सब विकारों से तिरे हुये प्रभु मेरे साथ हैं । अतः खोटे कलयुगी प्रेत हमारे आगे क्या करैंगे ? अर्थात् कुछ नहीं कर सकते हैं ।
जैसे समुद्र वा नदी से बाहर वन में अग्नि१ लगा हो, वह समुद्र वा नदी में नहीं जाता है और उनके जल में रहने वाले मत्स्य, कच्छादि को वह अग्नि रूप काल नहीं मार सकता और जैसे शुक पक्षी को घर तथा पिंजरा प्राप्त हो जाता है तब उसका शत्रु बाज पक्षी वन में ही रह जाता है, घर आकर पिंजरे में स्थित शुक पक्षी को नहिं मार सकता है ।
वैसे ही जिन भक्तों का रक्षक समर्थ परमात्मा है, उनको कलियुगी प्रेत और कालादिक कुछ भी भय नहीं होता है । सच्चे की बराबरी झूठा कभी नहीं कर सकता । सच्चा भक्त तो सहज स्वरूप परब्रह्म में समा जाता है और झूठा पुनः संसार में ही विलीन होता है । अतः हमारी तुम कुछ भी चिन्ता मत करो ।
उक्त पद सुनकर नरवद नगर में जाकर संत सेवा संबन्धी कार्यों में लग गये ।
इति श्री दादूचरितामृत विन्दु ८१ समाप्तः ।
(क्रमशः)

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