卐 सत्यराम सा 卐
जिन हम सिरजे सो कहाँ, सतगुरु देहु दिखाइ ।
दादू दिल अरवाह का, तहँ मालिक ल्यौ लाइ ॥
मुझ ही मैं मेरा धणी, पड़दा खोलि दिखाइ ।
आत्म सौं परमात्मा, प्रकट आण मिलाइ ॥
भरि भरि प्याला, प्रेम रस, अपणे हाथ पिलाइ ।
सतगुरु के सदिकै किया, दादू बलिबलि जाइ ॥
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साभार ~ Madhusudan Murari
सर्वत्र प्रकट उस अप्रकट परमात्मा का प्रेम से जब कोई भक्त अह्वाहन करने को तत्पर हो जाता है। तो वह ईश्वर तत्काल दृष्टिगोचर होने लगता है। क्योंकि वह ईश्वर कहीं दुर देश का वासी नहीं है जिसे आने में विलम्ब हो। निकट से भी निकटस्थ रहने वाला परमात्मा मात्र एक पुकार की दूरी पर है। भक्त हृदय इस शाश्वत सच्चाई से सदा ही परिचित रहे हैं। प्रहलाद के भक्ति भाव से हम सभी परिचित हैं। ये सिर्फ भक्त हृदय की सामर्थ्य है की वह उसे कहीं भी, कभी भी प्रत्यक्ष प्रकट कर लेता है।
जबकि अभक्त जिंदगी भर मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे के चक्कर काट कर भी अधुरे मृत्यु को प्राप्त होते हैँ। जीवन व्यर्थ रह जाता है। जिंदगी को सार्थक रंग देना हमारे ही हाथ में है। हमारा विवेकपूर्ण दृष्टिकोण हमारे जीवन का आधार है। हमें सदा ही स्वयं का अवलोकन करते रहना चाहिए कि हम कहाँ पर है ?

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