शनिवार, 6 अगस्त 2016

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卐 सत्यराम सा 卐
दादू राम रसायन भर धर्या, साधुन शब्द मंझार ।
कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥ २७ ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सतगुरु ने अपने शब्दों में राम - रस रूपी रसायन भरके शब्द बोले हैं । उत्तम मुमुक्षु, विचारवान्, शब्द ब्रह्म के विचार द्वारा स्वस्वरूप का अनुभव करते हैं और अन्तरप्रीति से अभेद निश्‍चय रूप राम - रस पीते हैं ॥ २७ ॥ 

शब्द सरोवर सुभर भर्या, हरि जल निर्मल नीर ।
दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अखिल शरीर ॥ २८ ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! ब्रह्मनिष्ठ गुरुदेव के शब्द रूप सरोवर में, ब्रह्मानन्द रूपी निर्मल नीर परिपूर्ण रूप से भरा हुआ है । उसको पीने वाले उत्तम साधकों के सम्पूर्ण शरीर, निर्विकार गुणातीत होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं ॥ २८ ॥ 

शब्दों मांहिं राम - रस, साधों भर दीया ।
आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥ २९ ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! संतों ने अपनी ब्रह्मवाणी रूप शब्दों में निर्गुण राम का भक्ति - वैराग्य - ज्ञान रूप रस भरा है । उन शब्दों से सृष्टि के आदि से अन्त पर्यन्त, सम्पूर्ण संतों ने उन शब्दों द्वारा ब्रह्मानन्द का अनुभव किया है । ब्रह्मऋषि कहते हैं कि हमने भी उसी प्रकार अब उस राम - रस को पान किया है ॥ २९ ॥ 
(श्री दादूवाणी ~ शब्द का अंग)
चित्र सौजन्य ~ मुक्ता अरोड़ा स्वरूप निश्चय

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