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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८२ =*
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*= प्रेतों की मुक्ति =*
"जय जय जय जगदीश तूं, तूं समर्थ सांई ।
सकल भुवन भाने घड़े, दूजा को नांहीं ॥टेक॥
काल मीच करुणा करैं, यम किंकर माया ।
महा जोध बलवंत बली, भय कंपै राया ॥१॥
ज़रा मरण तुम तैं डरे, मन को भय भारी ।
काम दलन करुणा मई, तूँ देव मुरारी ॥२॥
सब कंपै करतार तैं, भव बन्धन पाशा ।
अरि रिपु भंजन भयगता, सब विघ्न विनाशा ॥३॥
शिर ऊपर सांई खड़ा, सोई हम मांहीं ।
दादू सेवक राम का, निर्भय न डराहीं ॥४॥ "
हे जगदीश्वर ! आप सर्व प्रकार समर्थ स्वामी हैं । आपकी मन, वचन कर्म से जय हो । संपूर्ण भुवनों को आप ही उत्पन्न और नष्ट करते हैं । इस कार्य को करने वाला आपके बिना अन्य कोई भी नहीं है ।
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काल, मृत्यु, यमदूत और माया ये सभी आपके आगे दुःख पूर्ण शब्दों में विनय करते हैं । महान् योद्धा, बल संपन्न बलि भी आपके भय से कांपते हैं ।
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जरा, मृत्यु भी आपसे डरते हैं । मन को भी आप से बड़ा भय लगता है । मुरारिदेव ! आप काम के नाशक और करुणामय हैं ।
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आप सृष्टिकर्ता से सभी कांपते हैं । आप भव-बन्धन रूप पाश, बाह्य शत्रु और आन्तरिक कामादि वैरियों के तथा सभी विघ्नों के नाशक हैं । आपकी सेवा से भक्तों के भय दूर हो गये हैं ।
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जो परमात्मा सबके शिर पर हैं, वे ही हमारे हृदय में हैं । इसीलिए हम भगवान् के भक्त निर्भय हैं, डरते नहीं हैं । उक्त पद को सुनकर वह प्रचंड प्रेत अपनी कुचेष्टायें त्याग करके दादूजी महाराज के चरणों में आ पड़ा ।
(क्रमशः)
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