रविवार, 7 अगस्त 2016

=११६=

卐 सत्यराम सा 卐 
दादू कहै सतगुरु शब्द सुनाइ करि, भावै जीव जगाइ । 
भावै अन्तरि आप कहि, अपने अंग लगाइ ॥ 
दादू बाहरि सारा देखिये, भीतरि किया चूर । 
सतगुरु शब्दों मारिया, जाण न पावै दूर ॥
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साभार ~ Archana Maheshwari 
आप तामसी लोगो को भी संन्यास देते है? मैंने सुना है कि चीन में एक बहुत बड़ा सदगुरु हुआ, हुवांग पो। उसके पांच सौ शिष्य थे। बड़ा आश्रम था। पांच सौ भिक्षु उसके पास रहते थे। लेकिन एक भिक्षु बहुत उपद्रवी था। चोर भी था, और भी अनेक तरह की नशे की आदतें थीं। किसी तरह योग्य न था भिक्षु होने के। कई बार पकड़ा भी गया, रंगे हाथों भी पकड़ा गया। सारा आश्रम परेशान था। कि वह चोरी भी करता, नशा भी करता। कभी शराब पीए हुए चला आता है। बदनामी फैलती पूरे इलाके में कि यह किस तरह का संन्यासी है! शराबघरों में पाया गया है, जुआघरों में बैठा मिला है और भिक्षु है! 
गुरु के पास बहुत शिकायतें आती रहीं। हुवांग पो सुनता और बात टाल देता। लेकिन एक दिन तो हद हो गई। वह शराब पीकर बाजार में किसी से लड़ा, मारपीट की, किसी का सिर फोड़ दिया। वहां से लोग उसे पकड़े हुए लाए, लहूलुहान, और नशे में धुत और गालियां बकता हुआ। उस दिन तो बाकी शिष्यों ने कहा, आज कुछ निर्णय हो ही जाना चाहिए। अब यह आदमी एक क्षण भी भीतर नहीं रखा जा सकता। 
उन चार सौ निन्यानबे शिष्यों ने गुरु से एक स्वर से प्रार्थना की कि अब हम सब एक स्वर से प्रार्थना करते हैं, इसे यहां नहीं रखा जा सकता। गुरु ने कहा, तुम सब अच्छे लोग हो, तुम कहीं और भी चले जाओगे, तो शायद वहां से भी तुम सत्य को खोज लोगे, लेकिन इसका क्या होगा? तो तुम जा सकते हो, इसे छोड़ दो। इसको तो मेरी बहुत जरूरत है। तुम मेरे बिना भी खोज लोगे, यह मेरे बिना न खोज पाएगा। इसे छोड़ना तो ऐसे होगा, जैसे कि चिकित्सक बीमार को छोड़ दे और स्वस्थ का इलाज करे। तुम भले चंगे हो; तुम जा सकते हो। 
मेरे पास तो सब तरह के लोग आएंगे। अगर मैं उनके लिए हूं जो स्वस्थ हैं, तो मेरे होने का कोई अर्थ ही नहीं है। मैं उनके लिए भी हूं जो अस्वस्थ हैं। वस्तुत: तो उन्हीं के लिए हूं। मेरे पास रोज ऐसे मामले आते हैं। कोई आकर कहता है, फलां संन्यासी ऐसा काम करता पाया गया। आप कुछ कहते क्यों नहीं हैं? आप प्रोत्साहन देते हैं। आप चुप हैं। 
वह जो करता हुआ पाया गया है, वह तो स्थिति है, वह कोई नियति नहीं है। उस स्थिति को बदलना है। और वह अकेला नहीं बदल सकता, इसलिए तो मेरे पास आया है, नहीं तो खुद ही बदल लेता। वह अपने पैर से नहीं चल सका, इसलिए तो मेरे सहारे आया है। अब मैं सहारा खींच लूं? 
और दुनिया में बुराई बढ़ती है, क्योंकि भले लोग बुरे आदमियों के हाथ से सहारा छीन लेते हैं; उनको बुरा होने के लिए छोड़ देते हैं। जो उनकी स्थिति है, उसको उनकी नियति मान लेते हैं। 
जब भी मैं देखता हूं कि कोई आदमी कुछ बुरा कर रहा है, तो मेरी इच्छा यह नहीं होती कि उससे कहूं कि तू बुरा मत कर। क्योंकि यह तो बहुत बार उससे कहा गया है। अगर यही सुनकर वह ठीक हो सकता, तो ठीक हो गया होता। यह कहना तो व्यर्थ की पुनरुक्ति होगी। यह तो मूढ़ता होगी। यह तो कितने लोगों ने उससे नहीं कहा है कि बुरा मत कर। 
मैं उससे बुरे की बात ही नहीं करता। मैं उससे कुछ और करने को कहता हूं। निषेध पर मेरा जोर नहीं है। मैं उससे कहता हूं ध्यान कर, प्रार्थना कर, पूजा कर। मैं उसे कुछ करने में लगाना चाहता हूं। न करने की बात नहीं करता। जैसे जैसे ध्यान गहरा होगा, कुछ चीजें छूटनी शुरू हो जाती हैं। 
आदमी शराब पीता है, ध्यान गहरा होगा, छूट जाएगी। क्योंकि मेरा अनुभव यही है कि वह शराब भी इसीलिए पीता है कि एक तरह की ध्यान की आकांक्षा है। कोई और अमृतरूपी ध्यान उसे पता नहीं है। शराब सस्ती है, बाजार में मिल जाती है। वह शराब पीकर अपने को भुलाने की कोशिश में लगा है। भुलाने की कोशिश वहां है। अगर उसे ध्यान की कोई विधि मिल जाए, जिसमें वह सरलता से अपने को डुबा दे, तो शराब छूट जाएगी।
उसका प्रयोजन ही न रहा। धीरे धीरे तो वह पाएगा कि ध्यान में वह इतना ड़ब जाता है कि दुनिया की कोई शराब नहीं डुबा सकती। तब दुनिया की सब शराबें छूट जाएंगी। कोई व्यक्ति धन के पीछे पागल है, तो उसे रोकने का क्या प्रयोजन है? धन में ही उसने कुछ चीज देखी है, कोई शाश्वत की थोडीसी झलक देखी है। बाकी सब चीजें तो बदल जाती हैं; इस संसार में धन थोड़ासा स्थिर मालूम पड़ता है। 
प्रेम का भरोसा नहीं है, आज करे व्यक्ति, कल न करे। प्रियजनों का भरोसा नहीं है, आज जिंदा हैं, कल मर जाएं। आज मुंह है अपनी तरफ, कल पीठ कर लें। धन साथी मालूम पड़ता है। यह आदमी किसी साथी की तलाश में है। बाकी कोई भी साथी भरोसे योग्य नहीं मिलता। तो इसने धन से साथ जोड़ लिया है। इसको तुम कंजूस कहते हो, कृपण कहते हो। लेकिन गालियों से यह नहीं बदलने वाला। इसकी खोज भी बहुत गहरे में संगसाथ की चल रही है। कोई ऐसा साथी चाहता है जो कभी न छूटे। यह परमात्मा की खोज करना चाहता है। परमात्मा की छोटीसी झलक, गलत ही सही, इसे धन में दिखाई पड़ी है। इसलिए तो ज्ञानियों ने परमात्मा को परम धन कहा है। 
मैं तुमसे कहता हूं, तुम कैसे हो, इसकी मैं चिंता नहीं करता, क्योंकि तुम जैसे हो, वह तुम्हारी स्थिति है तुम्हारा स्वभाव नहीं। मैं तुम्हारे स्वभाव को देखता हूं। तुम्हारा स्वभाव परम है। तुम्हारा स्वभाव परमात्मा का स्वभाव है। उस पर कितनी ही राख की पर्तें जमी हों, मैं तुम्हारे भीतर के अंगार को देखता हूं। तुम्हारी राख की पर्तों को झाड़ देंगे। राख की पर्तें हैं, कुछ बहुत झाड़ने में समय भी नहीं लगता। राख ही है, जरा सा हवा का झोंका भी झाड़ देगा; भीतर का अंगार साफ हो जाएगा। 
गीता दर्शन ~ ओशो

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