🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रंथ२)*
*भक्तियोग नामक द्वितीय उपदेश*
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*मान महातम कछू न चाहै ।*
*एकै दशा सदा निर्बाहै ।*
*राव रंक की शंक न आनैं ।*
*कीरी कुंजर सम करि जानैं ॥५॥*
दुनिया में दूसरों से मान-बडाई पाने की आशा न रखे । हमेशा एक ही तरह का व्यवहार तथा आचरण करना चाहिये । धनवानों के साथ दूसरा और गरीबों के साथ दूसरा- यह साधक के लिये उचित नहीं । यहाँ तक कि कीड़े-मकोड़े के साथ या हाथी के साथ(अर्थात छोटे-बडे के साथ) समान भी(निर्वैरता का) व्यवहार करना चाहिये ॥५॥
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*आतम दृष्टि सकल संसारा ।*
*संतनि कौ राखै अधिकारा ।*
*वैर भाव काहू नहिं करई ।*
*सतगुरु शब्द हृदै मैं धरई ॥६॥*
संसार के प्राणियों को अपनी तरह समझे । जिससे अपने को कष्ट होता हो वैसा व्यवहार दूसरों के साथ न करे और अपने को जिससे सुख मिलता हो, वही व्यवहार दूसरों के साथ करना चाहिये । सज्जन लोगों को सद्व्यवहार से अपने अनुकूल रखना चाहिये । किसी से वैर भाव नहीं रखना चाहिये । तथा अपने सद्गुरु के उपदेशों पर आचरण करने के लिये हमेशा उन्हें अपने मन में रखना चाहिये ॥६॥
(क्रमशः)

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