रविवार, 7 अगस्त 2016

= विन्दु (२)८२ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८२ =*
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*= प्रेत की कुचेष्टायें =*
उक्त पद के द्वारा दादूजी का निश्चय जानकार फकीर तो अपने स्थान को चला गया । इधर सूर्य छिप गये । सब संत अपने-अपने आसनों पर बैठकर ब्रह्मध्यान करने लगे । रात्रि के समय इन स्थान में प्रेत के भय से वहां का कोई भी मनुष्य नहीं आता था ।
ध्यानादि साधन के पश्चात् सब संत दादूजी को सत्यराम दंडवत करके फिर बैठे, तब दादूजी ने सब संतों को कहा - कोई कुचेष्टा देखो तो भय नहीं करना, आप लोगोंके रक्षक भगवान् आपके पास ही हैं । फिर जब अर्धरात्रि का समय आया. तब प्रेत ने अपनी कुचेष्टायें करना आरंभ कर दिया ।
वह क्षण-क्षण में अपने रूप बदलने लगा । कभी मेढ़ा, कभी बकरा, कभी भैंसा, कभी गधा, कभी ऊंट बन जाता था । कभी पत्थर बरसने लगते थे, कभी वृक्षों की मोटी-मोटी शाखायें टूट-टूटकर पृथ्वी पर पड़ने लगती थी । फिर थोड़ी ही देर में बड़ी जोर से आंधी चलने लगी ।
आंधी बन्द हो गई तब क्षण भर में अग्नि जलने लगती थी और क्षण भर में बुझ जाती थी । प्रेत की उक्त चेष्टायें देखकर जो नवीन साधु हुये थे वे कुछ डरने लगे । उनको भयभीत देखकर दयालु संत दादूजी ने प्रेत को प्रेतयोनी के दुःख से छुड़ाने का विचार किया । फिर इस पद से परमात्मा की स्तुति करने लगे ।
(क्रमशः)

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