रविवार, 7 अगस्त 2016

=११५=

卐 सत्यराम सा 卐
दादू जब लग असथल देह का, तब लग सब व्यापै ।
निर्भय असथल आत्मा, आगै रस आपै ॥
जब नांही सुरति शरीर की, बिसरै सब संसार ।
आतम न जाणैं आप को, तब एक रह्या निरधार ॥ 
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साभार ~ Vijay Divya Jyoti
# तुम हो एक “अगोचर” सबके प्राणपति # 

“गो” का अर्थ होता है इंद्रियाँ और “गोचर” का आशय है जो इंद्रियों से देखा जा सके, सुना जा सके और महसूस किया जा सके। लेकिन आरती की इस पंक्ति में उस परम को अगोचर” कहकर संबोधित किया गया है अर्थात वो इंद्रियातीत है, इंद्रियों के अनुभव से परे है। जिसने जाना वही कह सकता है कि वो अगोचर है। 
आँखें बाहर देखती हैं, कान बाहर की आवाज सुनते हैं, त्वचा का स्पर्श बाहर ही महसूस होता है, नाक भी वाह्य जगत की सुगंध ही लेती है क्योंकि इंद्रियाँ प्रकृति का हिस्सा हैं और प्रकृति से ही जुड़ी हैं। प्रकृति बाहर है और परमात्मा भीतर। प्रकृति से जुडने के लिए इंद्रियों की आवश्यकता है और अगर इंद्रियाँ ना हों तो हमारा प्रकृति से नाता टूट जाएगा जैसे अंधे आदमी का क्या संबंध है प्रकाश से? बहरे का क्या संबंध है आवाज से? 
दूसरे से संबंध स्थापित करने के लिए आधार चाहिए जो इंद्रियों से मिलता है लेकिन अपने से जुडने के लिए किसी भी आधार की जरूरत नहीं होती बल्कि सारी इंद्रियों से संबंध तोड़कर ही भीतर प्रवेश होता है। सूरज चमक रहा हो तब भी हमारे भीतर रोशनी नहीं होती और कमरे में कितना ही अंधेरा हो मगर हमारे भीतर अंधेरा नहीं होता क्योंकि ये सारी घटनाएँ बाहर घट रही हैं। 
कितना भी गहन अंधकार हो लेकिन फिर भी अंधकार में हमें अपना पता तो चलता ही है कि मैं हूँ, भले ही उस स्थान पर रखी वस्तुओं का हमें आभास ना होता हो। उस स्थान पर अंधकार की वजह से किसी और की मौजूदगी का अहसास भले ही हमें ना होता हो पर अपनी मौजूदगी की प्रतीति तो हमें हर दशा में होती ही है। इसका मात्र कारण इतना है की आँख नाम की इंद्रिय केवल प्रकाश होने पर ही काम कर सकती है। अगर प्रकाश ना हो तो आँख बेकार हो जाती है मगर अपनी उपस्थिती के लिए हमें किसी प्रकाश की जरूरत नहीं है, अपना अहसास सतत बना रहता है क्योंकि हम वो हैं जो इंद्रियों के पीछे छुपा है और जब तक इंद्रियाँ क्रियाशील है तब तक उस देखने वाले को देख पाना संभव ही नहीं है । आँख तो खिड़की की तरह है मगर जो उस खिड़की से देखता है वो हम हैं और उस तक तो अक्रिय होकर ही पहुंचा जा सकता है। करने से जगत में प्रवेश मिलता है जबकि ना करने से परमात्मा में प्रवेश होता है।

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