मंगलवार, 2 अगस्त 2016

=१०५=

卐 सत्यराम सा 卐
सुन सुन पर्चे ज्ञान के, साखी शब्दी होइ ।
तब ही आपा ऊपजै, हम-सा और न कोइ ॥ 
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साभार ~ Anand Nareliya

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग-1) प्रवचन–1...osho
ज्ञान से भक्ति का क्षय हो जाता है। जितना आदमी जानकार होगा, उतना ही कम प्रेम हो जाएगा। जानना प्रेम की हत्या करता है। जानना जहर है प्रेम के लिए। क्योंकि प्रेम के लिए रहस्य चाहिए, प्रेम के लिए विस्मय—विमुग्धता चाहिए और ज्ञान तो रहस्य को छीन लेता है। ज्ञान तो कहता है : हम जानते हैं रहस्य क्या है?

छोटे बच्चे प्रेम कर सकते है—क्योंकि आश्चर्यचकित, विस्मय—विमुग्ध, अवाक!

छोटा बच्चा छोटी—छोटी चीजों के प्रेम मे पड़ जाता है—समुद्र के किनारे रंगीन पत्थर बीनने लगता है; शंख—सीप बीनने लगता है। तुम ज्ञानी हो, तुम कहते हो फेंको इनको, कचरा कहां ले जा रहे हो! बच्चे की समझ में नहीं आता कि इतना प्यार पत्थर, सूरज की रोशनी में ऐसे दमक रहा है हीरे जैसा! ऐसा प्यार शंख! वह बाप की नजर बचाकर खीसे में छिपा लेता है। उसे प्रेम उपजता है। उसे हर चीज से प्रेम उपजता है। वह हर चीज के पास ठिठककर खड़ा हो जाता है। घास में फूल खिला है और वह ठिठककर खड़ा हो जाता है। वह भरोसा नहीं कर पाता ऐसा प्यारा फूल, ऐसा अदभुत रंग! एक तितली उड़ी जा रही है, वह भरोसा नहीं कर पाता; वह भागने लगता है तितली के पीछे—ऐसा चमत्कार, जैसे फूल को पंख लग गए हों! हर चीज चमत्कृत करती है, उसे, क्योंकि वह कुछ भी नहीं जानता, अज्ञानी है, विस्मय से भरा है। आश्चर्य अभी उसका जीवित है।

फिर तुम धीरे—धीरे ज्ञान ठूसोगे, तुम हर चीज समझा दोगे। फिर एक दिन धीरे— धीरे जब वह विश्वविद्यालय से वापिस लौटेगा ज्ञानी होकर—सब गंवाकर और कोरे कागज साथ लेकर, सर्टिफिकेट लेकर—तब उसे कोई चीज विस्मय—विमुग्ध न करेगी। हर चीज का उत्तर उसके पास होगा। तुम पूछो—वृक्ष हरे क्यो है? वह कहेगा—क्लोरोफिल। बात खतम हो गयी। स्त्री सुंदर क्यो लगती है? हारमोन। बात खतम हो गयी। प्रेम क्या है? रसायनशास्त्र। वह समझा सकेगा सब। वह सब समझकर आ गया है। वह हर चीज को जानता है। अब अनजाना कुछ छूटा नहीं है, प्रीति कैसे उमगे! आश्चर्य ही मर गया। आश्चर्य की हवा में प्रीति उमगती है।

इसलिए तुम जानकर आश्चर्य चकित मत होना कि जैसे—जैसे आदमी का ज्ञान बढ़ा है वैसे—वैसे दुनिया मे प्रेम कम हो गया। यह स्वाभाविक परिणाम है। यह शाडित्य के सूत्र में छिपा है : तयोपक्षयाच्च।

देखते नहीं, तुम रोज देखते नहीं—दुनिया मे जितनी शिक्षा बढ़ती जाती है, उतना प्रेम कम होता जाता है। शिक्षित आदमी और प्रेमी, जरा मुश्किल जोड़ है! जितना शिक्षित, उतना ही कम प्रेमी। थोड़ा अशिक्षित होना चाहिए प्रेम के लिए। ग्रामीण के पास प्रेम है, शहरी के पास विदा हो गया। असभ्य के पास प्रेम है, सभ्य के पास नहीं। जो जितना सुसंस्कृत हो गया है, उसके पास औपचारिकता है, लेकिन औपचारिकता में कहीं कोई प्राण नहीं, कहीं कोई जीवन नहीं। वह जब तुमसे पूछता है, कहिए कैसे? कुछ नहीं पूछ रहा है। वह यह कह रहा है कि चलो, आगे बढ़ो। यह तो पूछना पड़ता है। हमें मतलब? तुम्हें मतलब? किसी को क्या लेना—देना है

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