卐 सत्यराम सा 卐
ब्रह्म गाय त्रिलोक में, साधु अस्तन पान ।
मुख मारग अमृत झरै, कत ढूँढै दादू आन ॥ ३२ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! यह सारा ब्रह्माण्ड ही विराट् का स्वरूप मानो गाय का स्थूल शरीर है, और व्यापक चेतन ही इसमें दूध है । इस गऊ के ब्रह्मवेत्ता संत ही स्तन हैं । अतः उन संतों के आत्म - उपदेश ही अमृत झरै कहिए - प्रकाशता है । इस प्रकार जिज्ञासु उन महापुरुषों की सत्संगति के द्वारा जीवन - मुक्ति का आनन्द रूप दूध पीते हैं । भक्ति या ज्ञान अमृत संतों को संगति में प्राप्त होता है ॥ ३२ ॥
अमी पताल न पाइये, नहीं ससि संग आकास ।
प्रत्यक्ष अमी जो पाइये, जैमल साधू पास ॥
दादू पाया प्रेम रस, साधु संगति मांहि ।
फिरि फिरि देखे लोक सब, यहु रस कतहूँ नांहि ॥ ३३ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सच्चे मुक्त संतों की संगति में परमेश्वर का प्रेमाभक्ति रूपी अमृत, साधक पुरुषों ने प्राप्त किया है । लोक - लोकान्तरों में घूम - घूम कर विचार कर देखा, तो मायिक सुख तो बहुत हैं, परन्तु अनन्य भक्तिरूपी यह सुख कहीं भी नहीं प्राप्त होता ॥ ३३ ॥
दादू जिस रस को मुनिवर मरैं, सुर नर करैं कलाप ।
सो रस सहजैं पाइये, साधु संगति आप ॥ ३४ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जिस ब्रह्मानन्द रूप रस के लिये देव, मनुष्य, मुनीश्वर, सब प्रयत्न करते हैं, वह ब्रह्मवेत्ता संतों की संगति में बिना प्रयास ही प्राप्त होता है । क्योंकि उत्तम जिज्ञासुओं के कल्याण के लिये परमेश्वर ही संतों के रूप में प्रकट होकर ज्ञान उपदेश करते हैं । जैसे ~ ब्रह्मऋषि दादू दयाल, कबीर साहिब आदि ॥ ३४ ॥
बाजिंद साधु संग को, फल कहा वर्णत कोइ ।
तांबा तैं कंचन भयो, पारस परसै सोइ ॥
(साधू का अंग ~ श्री दादूवाणी)
चित्र सौजन्य ~ मुक्ता अरोड़ा स्वरूप निश्चय

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