॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
श्री दादू अनुभव वाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
**= विरह का अँग ३ =**
विरह अग्नि में जल गये, मन के विषय विकार ।
तातैं पंगुल ह्वै रह्या, दादू दर दीदार ॥१४२॥
हमारे मन की विषय - वासना और कामादि विकार विरहाग्नि में जल गये हैं । इसी से यह अब लोकान्तर में जाने की इच्छा रूप पैरों से रहित होकर भगवद् - दर्शनार्थ एकाग्रता रूप द्वार पर स्थित है ।
जब विरहा आया दरद सौं, तब मीठा लागा राम ।
काया लागी काल ह्वै, कड़वे लागे काम ॥१४३॥
जब तीव्र वेदना सहित भगवद् विरह हमारे में प्रकट हुआ, तब एक मात्र राम ही मधुर लगने लगे । प्रथम देहासक्ति होने से जो देह सेवा ही प्रिय लगती थी, अब यह देहासक्ति काल रूप भासने लभी है, कारण देहासक्ति से ही बारम्बार मृत्यु होती है । प्रथम जो सांसारिक भोग प्राप्ति के कार्य प्रिय लगते थे, वे अब अति कटु प्रतीत होने लगे हैं, क्योंकि उन सकाम कर्मों का ही तो फल जन्मादि संसार है ।
.
.
**विरह - बाण**
जब राम अकेला रह गया, तन मन गया विलाय ।
दादू विरही तब सुखी, जब दरश परस मिल जाइ ॥१४४॥
विरह - बाणाघात का फल कह रहे हैं - जब विरह - बाणाघात से देहाध्यास और मन के विकार नष्ट हो जाते हैं, तब मन में एकमात्र राम का चिन्तन ही रह जाता है । फिर जब राम के दर्शन करके राम में ही मिल जाता है, तब ही विरही सुखी होता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें