शनिवार, 13 अगस्त 2016

= विन्दु (२)८२ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८२ =*
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*= कुंभरायमल को उपदेश =*
ईडवा में एक दिन कुंभरायमल दादूजी के दर्शन करने आये और सत्यराम बोलकर प्रणाम की । फिर हाथ जोड़े हुए कुछ जिज्ञासा लेकर दादूजी के सामने बैठ गये । तब दादूजी ने उनके मन की स्थिति जानकार उनके अधिकारानुसार यह पद बोलकर उपदेश दिया -
अब तो ऐसी बन आई, राम चरण बिन रह्यो न जाई ॥टेक॥
सांई को मिलबे के कारण, त्रिकुटी संगम नीर नहाई ।
चरण कमल की तहँ ल्यौ लागे, जतन जतन कर प्रीति बनाई ॥१॥
जे रस मीना छावर१ जावे, सुन्दरि सहजैं संग समाई ।
अनहद बाजे बाजन लागे, जिह्वा हीणे कीरति गाई ॥२॥
कहा कहूँ बरणि न जाई, अविगत अंतर ज्योति जगाई ।
दादू उनका मरम न जाने, आप सुरंगे बैन बजाई ॥३॥
आन्तर साक्षात् सत्संग का परिचय दे रहे हैं - अब तो हमारे ऐसी अवस्था बन गई है, राम के चरणों से दूर नहीं रहा जाता है ।
हम प्रभु से मिलने के लिये ही त्रिकुटी में होने वाले - इड़ा - गंगा, पिंगला - यमुना और सुषुम्ना - सरस्वती के संगम में ध्यान रूप स्नान करते हैं अर्थात् आज्ञा चक्र में ध्यान करते हैं वहां भगवत् चरणों में वृत्ति अच्छी प्रकार लगती है । इस प्रकार ध्यान रूप उपाय बारंबार करके हमने भगवान् में अनन्य प्रीति की है ।
अब जो अद्भुत प्रभु प्रेम - रस है, उसमें भीगा हुआ मन प्रभु पर निछावर१ हो रहा है और वृत्ति रूप सुन्दरी अनायास ही उनके संग रहकर उन्हीं में समा रही है अर्थात् ब्रह्माकार हो रही है । अब तो अनाहत बाजे बजने लग गये हैं और बिना ही जिह्वा से सविकल्प समाधि में हम भगवान् का यशोगान करते हैं ।
हे साधकों ! अब तो हमारी अवस्था ऐसी हो गई है - क्या कहें कुछ कहा नहीं जाता है । हृदय के भीतर अखंड ब्रह्म ज्योति जग रही है । उन परब्रह्म का ठीक - ठीक रहस्य तो हम नहीं जान पाते हैं किन्तु वे मनोहर प्रभु हमारे हृदय में आनन्द - रूप वेणु बजा रहे हैं । उसे सुनकर हम भी आनन्द में निमग्न होते रहते हैं ।
उक्त पद को सुनकर कुंभरायमल अत्यन्त प्रसन्न हुये और दादूजी को प्रणाम करके घर को चले गये । फिर एक दिन सन्त सेवा से अवकाश प्राप्त करके दादूजी महाराज के पास आये और प्रणाम करके हाथ जोड़े हुये कुछ जिज्ञासा लेकर दादूजी के सामन बैठ गये ।
(क्रमशः)


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