🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*केचित् मेलहिं मूंड ठगौरी ।*
*सब लै जांहि देखते त्यौरी ।*
*केचित् सिहर लगावहिं अंगा ।*
*बालक चलै लागि करि संगा ॥४७॥*
कुछ लोग मन्त्रसिद्ध राख(विभूति) से लोगों आधि-व्याधि हरने का दावा करते हैं और भोले-भाले लोगों के सिर पर वह विभूति डाल देते हैं तथा कुछ लोग अपने शरीर पर सिन्दूर लेपकर देखते-देखते पाखण्ड से लोगों का धन-धान्य, पाई-पैसा ठग कर ले जाते हैं ॥४७॥
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*केचित् मूठि चलावैं काहू ।*
*नारिसिंह भैरव तुम जाहू ।*
*केचित् आक धतूरा खांहीं ।*
*पुनि अंगार मेलहिं मुख मांहीं ॥४८॥*
कुछ मन्त्रसिद्धि के प्रभाव से मूठ(तलवार जैसा अस्त्र) शत्रु पर चलाकर मारने का दावा करते हैं और नृसिंह एवं भैरव आदि देवताओं को मन्त्रों के बल पर आदेश देने का ढोंग रचते हैं कि ‘तुम जाओ और अमुक शत्रु को मार आओ’ । कुछ लोग आक(मदार), धतूरा आदि विषैले पौधों के पत्ते, फल आदि खाकर भोलीभाली दुनिया पर अपनी सिद्धि का रोब जमाते हैं । तथा कुछ लोग जलते अंगारे(कोयले) मुँह में रखकर अपनी तथाकथित सिद्धि का प्रदर्शन करते हैं ॥४८॥
(क्रमशः)

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