#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
मैं मेरे में हेरा, मध्य मांहिं पीव नेरा ॥ टेक ॥
जहाँ अगम अनूप अवासा, तहँ महापुरुष का वासा ।
तहँ जानेगा जन कोई, हरि मांहि समाना सोई ॥ १ ॥
अखंड ज्योति जहँ जागै, तहँ राम नाम ल्यौ लागै ।
तहँ राम रहै भरपूरा, हरि संग रहै नहिं दूरा ॥ २ ॥
तिरवेणी तट तीरा, तहँ अमर अमोलक हीरा ।
उस हीरे सौं मन लागा, तब भरम गया भय भागा ॥ ३ ॥
दादू देख हरि पावा, हरि सहजैं संग लखावा ।
पूरण परम निधाना, निज निरखत हौं भगवाना ॥ ४ ॥ ======================
साभार ~ Gems of Osho
तुम चाहे लाख दिए और मोमबत्तियां जलाओ, इनसे तुम्हारे जीवन में रोशनी होने वाली नही है ।
असली दिवाली तो उस दिन समझना जिस दिन तुम्हारे भीतर का दिया जले, उससे पहले तो सब अन्धकार ही समझो ।
और राम के घर लौटने से तुम्हारा क्या लेना देना ? बात तो उस दिन बनेगी जिस दिन तुम अपने घर अपने भीतर लौटोगे ।
तो बाहर की रोशनी और त्योहारो में मत उलझना, भीतर की रोशनी को जगाने के उपाय खोजो ।
घर के दरवाजे खोलने से धन नहीमिलेगा, मन के दरवाजे खोलो जिनके खुलते ही खजाने प्रगट हो जाते है ।
बाहर तो भटकाव है, भीतर है समाधान । बाहर तो सिर्फ हार है असली त्यौहार तो भीतर है ।

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