शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

=१६८=

#daduji 
卐 सत्यराम सा 卐 
मैं मेरे में हेरा, मध्य मांहिं पीव नेरा ॥ टेक ॥ 
जहाँ अगम अनूप अवासा, तहँ महापुरुष का वासा । 
तहँ जानेगा जन कोई, हरि मांहि समाना सोई ॥ १ ॥ 
अखंड ज्योति जहँ जागै, तहँ राम नाम ल्यौ लागै । 
तहँ राम रहै भरपूरा, हरि संग रहै नहिं दूरा ॥ २ ॥ 
तिरवेणी तट तीरा, तहँ अमर अमोलक हीरा । 
उस हीरे सौं मन लागा, तब भरम गया भय भागा ॥ ३ ॥ 
दादू देख हरि पावा, हरि सहजैं संग लखावा । 
पूरण परम निधाना, निज निरखत हौं भगवाना ॥ ४ ॥ ====================== 
साभार ~ Gems of Osho 
तुम चाहे लाख दिए और मोमबत्तियां जलाओ, इनसे तुम्हारे जीवन में रोशनी होने वाली नही है । 

असली दिवाली तो उस दिन समझना जिस दिन तुम्हारे भीतर का दिया जले, उससे पहले तो सब अन्धकार ही समझो । 

और राम के घर लौटने से तुम्हारा क्या लेना देना ? बात तो उस दिन बनेगी जिस दिन तुम अपने घर अपने भीतर लौटोगे । 

तो बाहर की रोशनी और त्योहारो में मत उलझना, भीतर की रोशनी को जगाने के उपाय खोजो । 

घर के दरवाजे खोलने से धन नहीमिलेगा, मन के दरवाजे खोलो जिनके खुलते ही खजाने प्रगट हो जाते है । 

बाहर तो भटकाव है, भीतर है समाधान । बाहर तो सिर्फ हार है असली त्यौहार तो भीतर है

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