शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

=१६७=

卐 सत्यराम सा 卐 
तुम हरि हिरदै हेत सौं, प्रगटहु परमानन्द ।
दादू देखै नैन भर, तब केता होइ आनन्द ॥ ८१ ॥ 
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! ब्रह्मऋषि अपने को उपलक्षण करके भक्तों की परम प्रेम - प्रीति का प्रतिपादन करते हैं कि हे प्रभु ! हे हरि ! हे परमानन्द स्वरूप ! हमारे अन्तःकरण में आपकी अनन्य भक्ति का भाव उदय करके आप अपने भक्तों को दर्शन दीजिए । ताकि हम अपने स्थूल नेत्रों से आपके दर्शन करके अथवा विवेक वैराग्यरूपी नेत्रों से आपके व्यापक स्वरूप का दर्शन करके कृत कृत्य भाव को प्राप्त होवें ॥ ८१ ॥ 

प्रेम पियाला राम रस, हमको भावै येहि ।
रिधि सिधि मांगैं मुक्ति फल, चाहैं तिनको देहि ॥ ८२ ॥ 
टीका ~ हे प्रभु ! हमारे को तो कहिए, आपका निष्काम पतिव्रत - धर्म धारण करने वाले भक्तों के लिए तो आपकी प्रेमा - भक्ति रूप रस से परिपूर्ण प्रेम का प्याला पिलाइये, यही एक हमारी प्रार्थना है । नौ निधि, आठ सिद्धि, चार प्रकार की मुक्ति और चार फल, इनकी जिनको इच्छा लगी है, उनको देओ । हमारे तो इनकी कोई इच्छा नहीं है ॥ ८२ ॥ 
छन्द ~ 
नीर बिन मीन दुखी, क्षीर बिन शिशु जैसे, 
पीर जाके दवा बिन कैसे रह्यो जात है ।
चातक जू स्वाति बूंद, चंद को चकोर जैसे, 
चंदन की चाह करि सर्प अकुलात है ॥ 
नीधन ज्यूँ धन चाहै, कामिनि कूं कंत चाहै, 
ऐसी जाके चाहि ताहि कछू न सुहात है ।
प्रेम को प्रभाव ऐसो, प्रेम तहाँ नेम कैसो, 
"सुन्दर" कहत यह प्रेम ही की बात है ॥ 
(श्री दादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)
चित्र सौजन्य ~ Bodhi Anupama

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