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॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
**= विन्दु ८४ =**
**= राजा का सुवर्ण माला देने का आग्रह =**
फिर राजा एक सुवर्ण की माला लेकर दादूजी के पास आया और माला दादूजी के आगे रखकर कहा - यह अवश्य धारण करलो । सब ही साधु माला रखते हैं, आपको भी माला रखनी ही चाहिये । तुलसी की नहीं रक्खो तो यह सुवर्ण की माला ही फिराया करो । यह आज्ञा तुम मेरी अवश्य मान लो । राजा का उक्त वचन सुनकर दादूजी महाराज बोले -
"सुध बुध जीव धिजायकर, माला संकल बाहि ।
दादू माया ज्ञान से, स्वामी बैठा खाय ॥"
अर्थात् अपनी बातों से शुद्ध बुद्धि वाले साधारण प्राणियों का अपने में विश्वास कराकर उनके गले में माला रूप सांकल डाल देते हैं फिर उस मायिक ज्ञान से ही उनके गुरु रूप स्वामी उनसे भेंट रूप द्रव्य लेकर बैठे बैठे खाते रहते हैं । हमको वैसा नहीं करना है । अतः हमें सुवर्ण माला नहीं चाहिये । हम तो सदा ही मन रूप माला फेरते रहते हैं अर्थात् मन से ही प्रभु का स्मरण करते हैं ।
माला स्मरण में सहायक नहीं है, केवल जप संख्या के लिए ही रखी जाती है । हमें संख्या करने की आवश्यकता नहीं है । संख्या की आवश्यकता सकामियों को होती है । हम तो निरंतर निष्काम भाव से स्मरण करते रहते हैं । अतः यह सुवर्ण की माला को तुम यहाँ से शीघ्र उठालो । हमारे यहाँ सुवर्ण और काष्ठ में कोई भेद नहीं है । आप हमको सुवर्ण के प्रलोभन में फँसाने के लिए ऐसा कर रहे हैं किंतु हमको सुवर्ण की इच्छा नहीं है । सोने से परमात्मा प्राप्ति रूप कार्य सिद्ध नहीं होता है । सोना तो सांसारिक भोग प्राप्ति का ही साधन है, सो सांसारिक भोगों की की हमें इच्छा नहीं है । और तुमको यह मेरी आज्ञा अवश्य मान लेनी चाहिए, सो तो हम विश्व के राजा राम की आज्ञा सदा शिर पर रखते हैं । सब कार्य उनकी आज्ञा से करते हैं । वे सब राजाओं के भी राजा हैं ।
(क्रमशः)

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