शनिवार, 22 अप्रैल 2017

= विन्दु (२)९८ =

॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू चरितामृत(भाग-२)* 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*= विन्दु ९८ =*
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*= परशुरामजी के वचन =* 
फिर परशुरामजी महाराज ने उन संतों को कहा - पहले हम दादूजी को साधारण व्यक्ति ही समझते थे किन्तु एक समय खोजीजी पालड़ी वाले और हम कुछ दिन साथ रहे थे । उन दिनों में मैं अपने भाषण के समय अपने संप्रदाय की साधना साकार की पूजा आदि को हि श्रेष्ठ बताते हुये दादूजी का नाम लेकर दादूजी के सिद्धान्त का खंडन करता था, तब मेरे मेरे को एक दिन प्रवचन के पश्चात् सब गृहस्थ श्रोता चले गये तब खोजीजी ने कहा - महाराज ! आप अपनी संप्रदाय में प्रचलित साकार उपासना की पुष्टि करते हैं और दादूजी का नाम लेकर निराकार साधना का खंडन करते हैं । यह तो उचित नहीं है । 
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मैंने कहा - क्यों ? खोजीजी ने कहा - यह तप आप अपने संप्रदाय की साधना के उत्तर भाग का ही खंडन करते हैं । मैंने कहा - कैसे ? खोजीजी ने कहा - निम्बार्क संप्रदाय का सिद्धान्त ‘द्वैताद्वैत’ है । अतः उसमें द्वैत और अद्वैत दोनों का समावेश है और दादूजी की ‘निराकार साधना’ निराकार ब्रह्म की उपासना भी है तथा अद्वैत का साधन भी है और उनका सिद्धान्त भी अद्वैत ही है । जब अद्वैत को आप दादू का मन माना सिद्धान्त कहेंगे तो आपकी संप्रदाय का अद्वैत किस का मन माना कहेंगे । इसलिये अद्वैत मन माना सिद्ध न होकर वेद कथित सार सिद्धान्त है । यदि कोई साधारण व्यक्ति ऐसे वचनों कहे तब तो कोई बात नहीं किन्तु आपतो विद्वान् हैं सब कुछ जानते हैं और संप्रदाय के आचार्य हैं । आपका ऐसा कथन आपकी ही साधना का घातक हो सकता है । 
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फिर खोजीजी ने कहा - मैंने संत प्रवर दादूजी के विचार भी सम्यक् प्रकार समझे हैं तथा उनका व्यवहार भी अच्छी प्रकार ध्यान से देखा है । वे उच्चकोटि के संत हैं । इसमें कुछ भी संदेह नही है । उक्त प्रकार खोजीजी के कथन को सुनकर मैंने भी विचार किया - दादूजी केवल माला, तिलक, कंठी, मूर्ति पूजा आदि का ही आदर नहीं करते हैं परन्तु आन्तर साधना तो उनकी अति उत्तम है । उनके संग से अनेक व्यक्ति आन्तर साधना करके अति हर्ष युक्त होते दिखाई देते हैं । फिर मैंने अपने ध्यान द्वारा भी देखा तो दादूजी बहुत उच्चकोटि के सन्त ही मुझे ज्ञात हुये थे । उक्त प्रकार विचार करके तथा ध्यान द्वारा देख करके मैंने खोजीजी को कहा - आपका कथन सत्य ही है । मैंने भी अपनी योगशक्ति से देख लिया है कि दादूजी उच्चकोटि के संत हैं । किन्तु प्रवचन में दादूजी की तथा दादूजी की साधन पद्धति की श्लाधा करूंगा तो मेरे भक्त भी उनकी ओर जाने लगेंगे । इससे हमारी संप्रदाय की साधना में शिथिलता अवश्य आयेगी किन्तु अब से आगे मैं दादूजी की साधना पद्धति का खण्डन नहीं करूँगा, अपनी साधन पद्धति की ही श्रेष्ठता कथन करता रहूँगा । 
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फिर कुछ समय के बाद मैंने मेरे बुद्धिमान् और कवि शिष्य नारायण - बाला को दादूजी के विचार व्यवहार को देखकर अच्छी प्रकार दादूजी की परीक्षा करने के लिये दादूजी के पास साँभर भेजा था । नारायण - बाला वहां उनके पास साँभर में जाकर कुछ समय उनके पास ही रहा । फिर जब उसको संतोष हो गया कि मैंने दादूजी की परीक्षा भली भांति से ले ली है । तब वह दादूजी से आज्ञा लेकर मेरे पास सलेमाबाद आया और मेरे पूछने पर उसने दादूजी के विषय में एक कवित्त कहा सो यह है - 
ध्रू को सो ध्यान प्रचो प्रहलाद को, 
नामा की नांई निरंजन मोहै । 
सैन की साँच धना की सी धीरज, 
दास कबीर की उपमा सोहै ॥ 
शुकदेव सो शूर गोरक्षसो ज्ञानि सु, 
दत्त की देह दिगम्बर जो है । 
सोच कहै सु नारायण - बाला जु, 
दादू दयाल की सरबरि को है ॥” 
उक्त पद्य द्वारा नारायण-बाला ने जब दादूजी की प्रशंसा की तब मैंने नारायण-बाला को कहा - यदि दादूजी तुमको ऐसे ज्ञात हुये हैं तो तुम दादूजी के पास ही जाकर रहो, यहां रहने से तुम हमारे दूसरे साधकों को भी भ्रम में डालोगे । उनके संस्कार ऐसे होने से हमारी साकारोपासना पर आघात पहुँचेगा । फिर नारायण-बाला मेरी आज्ञा मान करके दादूजी के पास साँभर रहने लगा था । ऐक बार अपने भक्तों के आग्रह से मैं भी साँभर गया था तब दादूजी से मिला था । वे बहुत सरल स्वभाव के महान् ज्ञानी संत थे । उनकी ज्ञान चर्चा से मुझे भी बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ था । उनकी साधना अवश्य निराकार की उपासना रूप ही थी । किन्तु वे साकार उपासना के विरोधी भी नहीं थे । 
तत्त्ववेत्ताजी प्रथम दादूजी के पास ही गये थे और उनका सत्संग भी किया था किन्तु दादूजी की निर्गुण उपासना पद्धति तत्त्ववेत्ताजी को विशेष रुचिकर नहीं थी । फिर तत्त्ववेत्ताजी ने दादूजी को कहा - मेरे को तो आप साकार उपासना बतावें, मुझे वही विशेष प्रिय लगती है । तब दादूजी ने तत्त्ववेत्ताजी को कहा - हमारे यहां तो निर्गुण ब्रह्म की ही उपासना होती है, यदि आप सगुण की उपासना करना चाहो तो सलेमाबाद में परशुरामजी महाराज के पास जावें वहां सगुण उपासना का ही केन्द्र है । वहां आपके लिये बहुत अच्छा रहेगा । 
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यह उक्त वचन मेरे को तत्त्ववेत्ताजी ने ही मेरे पास आकर सुनाये थे । उक्त तत्त्ववेत्ताजी के वचनों से भी दादूजी की सरलता, सत्यता, निराभिमानता आदि दैवी गुणों का तथा सर्व हितैषिता आदि का परिचय मिलता है । वे सम शांत संत थे । इसलिये उनका गमन जानकार मेरे मन में यही भाव उठ रहा है कि आज भारत का एक महान् ज्ञानी संत अदृश्य हो गया है । 
(क्रमशः)

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