गुरुवार, 1 जून 2017

श्री गुरूदेव का अंग ३(२१-२४)

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*मीरां मुझ सौं महर कर, सिर पर दीया हाथ ।*
*दादू कलियुग क्या करै, सांई मेरा साथ ॥*
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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३. श्री गुरूदेव का अंग ~ २१/२४*
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गुरु दादू के दस्त१ में, जन रज्जब की जान ।
ज्यों राखे त्यों रहेंगे, सदक२ दिया सुबहान३ ॥२१॥
मुझ शिष्य के प्राण गुरु दादू जी के हाथों१ में हैं, वे जैसे भी रक्खेंगे वैसे ही मैं रहूँगा । मैंने तो उन्हीं को परमेश्वर३ समझ कर उन पर अपने को निछावर२ कर दिया है ।
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आदि अंत मधि ह्वै गये, सिद्ध साधक शिरताज ।
जन रज्जब के जीव की, गुरु दादू को लाज ॥२२॥
सृष्टि के आदि, मध्य और अन्त तक अर्थात मेरे जन्म तक साधकों के शिरोमणी अनेक सिद्ध हुये हैं, किन्तु मेरे जीवात्मा की मुक्ति करना रूप लाज तो श्री गुरु दादूजी को ही रखनी पड़ी है ।
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दादू के दीदार में, रज्जब मस्त मुरीद१ ।
खिल२ खाना३ कुरबान कर, कीया सखुन४ खरीद ॥२३॥
गुरु दादू जी के दर्शन करने में ही मैं शिष्य१ मस्त रहता हूँ । निश्चय२ पूर्वक कहता हूँ मैंने अपने घर३, भोजनादि सभी दादू जी पर निछावर कर दिये हैं दादू जी ने अपने उपदेश रूप वचनों४ से मुझे खरीद लिया है ।
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गुरु दादू का ज्ञान गहि, रज्जब कीया गौन ।
तन मन इन्द्रिय अरी दलन, मुंहडे आवे कौन ॥२४॥
तन मन और इन्द्रियों को संयम में रखने वाला तथा कामादि शत्रुओं का नाशक गुरुदेव दादू जी का ज्ञान ग्रहण करके मैंने परब्रह्म प्राप्ति के मार्ग में गमन किया है, अतः मेरे को बीच में रोकने वाला मेरे सन्मुख कौन आ सकता है ? अर्थात कोई भी नहीं आ सकता ।
(क्रमशः) 

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