卐 सत्यराम सा 卐
*बुरा भला सिर जीव के, होवै इस ही मांहि ।*
*दादू कर्त्ता कर रह्या, सो सिर दीजै नांहि ॥*
============================
साभार ~ Chetna Kanchan Bhagat
बंगाल में एक बहुत बड़े आदमी हुए, ईश्वरचंद्र विद्यासागर। तुमने नाम भी सुना होगा। वे एक नाटक देखने गए। उस नाटक में एक पात्र है जो एक स्त्री को बहुत बुरी तरह परेशान कर रहा है, उसके पीछे लगा हुआ है, उसे हैरान कर रहा है, उसे दुख दे रहा है। आखिर में, विद्यासागर सामने बैठे-बैठे देख रहे थे, उनको इतना गुस्सा आ गया कि वे यह भूल गए कि यह नाटक है, उन्होंने निकाला जूता और उस पात्र को उठा कर मार दिया। जूता निकाल कर उसको मार दिया बहुत जोर से।
.
वे यह भूल गए कि वे नाटक देख रहे हैं। उनको धीरे-धीरे यही खयाल हो गया कि यह आदमी शैतान है, बदमाश है, और स्त्री को परेशान कर रहा है। लेकिन वह अभिनेता जो था, उसने उस जूते को हाथ में लिया, सिर से लगाया और कहा कि मेरे जीवन में इससे बड़ा पुरस्कार मुझे कभी भी नहीं मिला। विद्यासागर जैसे आदमी को भी मेरा नाटक इतना सच मालूम पड़ा कि वे जूता मार सके, इससे बड़ा पुरस्कार और क्या हो सकता है ! मेरा अभिनय सफल हो गया। विद्यासागर तो बहुत संकोच में हुए, बड़े दुखी हुए। लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि मैं भूल ही गया था कि वह नाटक था !
.
तो नाटक में भी हम भूल जाते हैं कि वह नाटक है। विद्यासागर जैसे समझदार आदमी भी भूल जाते हैं। इससे ठीक उलटा करने की जरूरत है। जैसे नाटक में भूल जाते हैं कि नाटक है और जीवन लगने लगता है, ऐसा ही कभी दिन में, कभी दो दिन में घड़ी आधा घड़ी को जीवन को भी ऐसे देखना चाहिए जैसे वह नाटक है। ठीक उलटा। अभी तो हम नाटक को भी जीवन मान कर उपद्रव में पड़ जाते हैं, कभी ऐसा मौका निकालना चाहिए - दिन में, रात में, सोते वक्त - थोड़ी देर के लिए बैठ कर जीवन को भी ऐसे देखना चाहिए जैसे वह नाटक है और मैं केवल देखने वाला हूं।
-ओशो ~ समाधि कमल
(प्रवचन--14) से...

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें