🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
.
*= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४) =*
.
*हैरान है हैरान है, हैरान निकट न दूर ।*
*भी सखुन क्यों करि कहैं तिसकौं,*
*सकल है भरपूर ॥*
*सम्बाद पीर मुरीद का यह,*
*भेद पावै कोइ ।*
*जो कहैं सुन्दर सुनै उही सुन्दर होइ ॥८॥*
॥ स्माप्तोSयं पीर-मुरीद अष्टक ग्रन्थः ॥
हर एक ज्ञानी उस ब्रह्म का साक्षात्कार करने के बाद उस का जैसा का तैसा वर्णन करने में हैरान हो जाता है, चकित रह जाता है, अवाक् हो जाता है । उसे निकट भी नहीं कह सकते(क्योंकि वह अदृश्य है), दूर भी नहीं कह सकते(क्योंकि वह सर्वव्यापक है), वाणी के द्वारा उसका कितना सा वर्णन हो सकता है जो इस विश्व में व्याप्त है ।
.
इस तरह यह गुरु-शिष्य-संवाद पूरा हुआ । इस संवाद का वास्तविक रहस्य(सचाई) कोई विरला व्यक्ति ही समझ सकता है, कह सकता है । इस भेद(रहस्य) को कहने(उपदेश करने) वाला(गुरु) और सुनने वाला(शिष्य) - दोनों ही उत्तम हैं, जगत् में श्रेष्ठ हैं, पूज्य हैं, वन्दनीय हैं । उन्हीं दोनों का जीवन सफल है(क्योंकि एक उस ब्रह्म को पा चुका है दूसरा प्रयास करके पाने जा रहा है) ये ही दोनों धन्य हैं, बाक़ी दुनिया तो चौरासी लाख योनियों के आवगमन में ही फँसी हुई है ॥८॥
*= ॥ पीर-मुरीद अष्टक समाप्त ॥ =*
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें