#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
.
*साधु परीक्षा लक्षण*
साधु शिरोमणि शोध ले, नदी पूर पर आइ ।
सजीवनि साम्हा चढे, दूजा बहिया जाइ ॥५८॥
सँत परीक्षा का लक्षण बता रहे हैं - जैसे सँजीवनी बूटी की परीक्षा नदी के प्रवाह पर आकर की जाती है, जल - प्रवाह में डालने पर उसका तृण मच्छी के समान प्रवाह के सन्मुख चलता है, अन्य तृण प्रवाह के साथ ही बहते हैं, वैसे ही उत्तम सँत को सँसार के प्रवाह में खोजो । जो साँसारिक वृत्ति रूप प्रवाह में न बहकर ब्रह्माकार - वृत्ति की स्थिरता रूप प्रवाह के सामने चलता है, वही सजीवन(जीवन्मुक्त) सन्त है ।
.
*सज्जन - दुर्जन*
जिनके मस्तक मणि बसे, सो सकल शिरोमणि अँग ।
जिनके मस्तक मणि नहीं, ते विष भरे भुवँग१ ॥५९॥
सज्जन, दूर्जन का लक्षण कह रहे हैं - जिन सर्पों के मस्तक में मणि होती है, वे ही उत्तम माने जाते हैं । वैसे ही जिनके मन रूप मस्तक में पराभक्ति - मणि होती है, वे ही उत्तम सज्जन सँत कहलाते हैं और जैसे मणि - रहित सर्प१ केवल विष से ही भरे होते हैं, वैसे ही जो भक्ति - मणि से रहित विषय - वासना विष से भरे हुये हैं, वे ही दूर्जन हैं । यह साखी ठट्ठा नगर से आई हुई माता को कही थी । प्रसंग कथा - दृ - सु - सि - ११ - १३२ में देखो ।
.
*साधु महिमा*
दादू इस सँसार में, ये द्वै रत्न अमोल ।
इक सांई अरु सँत जन, इनका मोलन तो ॥६०॥
६० - ६१ में सँत महिमा कहते हैं - इस सँसार में एक परमात्मा और सँत ये दो ही अमूल्य रत्न हैं । इनका मूल्य वो माप नहीं हो सकता ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें