मंगलवार, 14 नवंबर 2017

= १६४ =

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू सिरजनहार के, केते नाम अनन्त ।*
*चित आवै सो लीजिये, यों साधु सुमरैं संत ॥* 
*दादू जिन प्राण पिण्ड हमकौ दिया, अंतर सेवैं ताहि ।*
*जे आवै ओसण सिर, सोई नांव संवाहि ॥* 
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साभार ~ ‎Krishnacharandas Aurobindo
Remember SriKrishna, eat with him...eat for Him...eat Him(His name and remembering that He alone has become the food....
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अन्नम् अन्नाद(अन्नदाता)अत्ता (अन्नका भोक्ता)....
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eat for Him and not for palate...as an offering to Him....inner dweller. Sleep with Him...drink Him....do everything for Him....remembering that He alone is the doer and for Him all Mother-Nature Prakruti is doing Yoga in whole creation....offer Him all that you have...all that you are...Let all of thyself become SriKrishna...this is thy goal....!!!! 
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कृष्ण के लिये जियो ... श्रीकृष्ण के लिये श्रीकृष्ण के साथ खाओ(श्रीकृष्ण ही अन्न, अन्नाद - अन्नदाता, अत्ता - अन्न तथा समस्त भोगोंका असली भोक्ता है।), श्रीकृष्ण के लिये श्रीकृष्ण के साथ जागो, सोओ-उठो-बैठो.... समस्त क्रिया श्रीकृष्ण के लिये करो, ये स्मरण रखकर कि असली कर्ता अंतर्यामी, सबका अंतरवासी तो श्रीकृष्ण ही है....!!! 
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समस्त प्रकृतिरुप में जगदंबा उन्हीं श्रीकृष्ण की प्रसन्नता/अभिव्यक्ति के लिये समस्त सृष्टि में... सभी के अंदर महायोग कर रही है। उसमें अपना सहयोग कर अपने तथा विश्व में भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य में हाथ बटाओ। अपना सब कुछ उसे अर्पण करो क्योंकि सब कुछ उसी का है... तुम जो हो(अच्छे-बुरे)... तुम्हारे पास जो है सब उसी भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों में समर्पित करो .... यही जीवन है...!!! यही तो लक्ष्य है। कृष्णमय हो जाओ... क्योंकि यही तुम्हारा वास्तविक लक्ष्य है।
- श्रीअरविंद

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