बुधवार, 15 नवंबर 2017

ब्रह्म अग्नि का अंग १२(५-७)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू जब घट अनुभै उपजै, तब किया कर्म का नाश ।
भय अरु भ्रम भागे सबै, पूरण ब्रह्म प्रकाश ॥ *
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
**ब्रह्म अग्नि का अंग १२**
मन मनसा१ तत२ पंच ले, पुनि रज्जब रग रोम । 
इह३ जगि४ जग में जगमगै५, ब्रह्म अग्नि मधि होम ॥५॥ 
मोह निद्रा से जागकर३ मन-बुद्धि१ के विकार, पाँचों तत्त्व२ से उत्पन्न पंच विषयों का राग और रग-रोम अर्थात स्थूल शरीर का अध्यास इन सबको ब्रह्म-अग्नि में होम दे अर्थात ब्रह्म ज्ञान द्वारा नष्ट कर दे तभी इस४ जगत् में साधक का का ब्रह्म तेज चमकने५ लगता है । 
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विरह अग्नि की हद्द है, ब्रह्म अग्नि बेहद्द । 
रज्जब रोवे दिवस दश, ज्ञान अखंडित गद्द१ ॥६॥ 
विरह अग्नि की तो सीमा है, उससे वियोगी दश दिन अर्थत कुछ काल ही रोता है, प्रियतम के प्राप्त होने पर विरहाग्नि शांत हो जाता है किन्तु ब्रह्म-ज्ञान रूप अग्नि बेहद्द है, ब्रह्म प्राप्ति हो जाने पर भी ब्रह्म रूप से अखंडित रहता है और नम्र हृदय में उसकी "अहंब्रह्मास्मि" रूप आवाज१ निरन्तर होती रहती है । 
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ब्रह्म अग्नि वडवा अनल१, तन तोयों२ को खाय ।
इश्क अग्नि काची कहैं, जो वपु वारि बुझाय ॥७॥ 
जैसे वडवानल अग्नि१ समुद्र के जल२ समूह को खाता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान रूप अग्नि तनाध्यासादि को खा जाता है । जो प्रियतम के शरीर का संयोग होते ही बुझ जाता है वह विरह-प्रेम रूप अग्नि तो कच्चा ही कहलाता है ।
(क्रमशः)

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