सोमवार, 27 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/८८-९०)


#daduji 
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५* 
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साहिब का उनहार सब, सेवक माँहीं होइ । 
दादू सेवक साधु सो, दूजा नाहीं कोइ ॥८८॥ 
परमात्मा के समान ही भक्त में दिव्य गुण होते हैं । अत: वह परमात्मा ही श्रेष्ठ भक्त के रूप में अवतरित होता है । इस कारण कोई भी श्रेष्ठ भक्त परमात्मा से भिन्न नहीं होता ।
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जब लग नैन न देखिये, साधु कहैं ते अँग । 
तब लग क्यों कर मानिये, साहिब का प्रसंग ॥८९॥ 
सँतजन ब्रह्म साक्षात्कार होने पर जो निर्द्वन्द्वता, समतादि लक्षण आते बताते हैं, जब तक वे लक्षण विचार - नेत्रों से जिस व्यक्ति में नहीं दिखाई देते, तब तक उस व्यक्ति की यह बात कि - "मुझे ब्रह्म का साक्षात्कार हो गया है" कैसे मानी जा सकती है ? 
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दादू सो जन साधू सिद्ध सो, सोइ सकल शिरमौर ।
जिहिं के हिरदै हरि बसे, दूजा नाहीं और ॥९०॥
जिसके हृदय में हरि का विशेष रूप से निवास है, वही सँत है, वही सिद्ध है और वही सर्व - श्रेष्ठ है । दूसरा और कोई भी सँत, सिद्ध और सर्वश्रेष्ठ नहीं हो सकता । 
(क्रमशः)

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