शनिवार, 25 नवंबर 2017

भयभीत भयानक का अंग १४(२०-४)

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卐 सत्यराम सा 卐
*संगी थाके संग के, मेरा कुछ न वशाइ ।*
*भाव भक्ति धन लूटिये, दादू दुखी खुदाइ ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
**भयभीत भयानक का अंग १४**
निडर निलज्ज निश्शंक ह्वै, पूरि करे अपराध । 
जन रज्जब जग सौं रचे, परिहर संगति साध ॥२१॥ 
जो निडर, निलज्ज और निश्शंक होता है, वह पूर्ण रूप से पाप ही करता रहता है और संतों की संगति को छोड़ कर संसार के पापी प्राणियों से ही प्रेम करता है । 
भय भाग्यूं भूले भजन, सत संगति रुचि नाँहिं । 
जन रज्जब सेवा गई, संशय नाँहिं माँहिं ॥२२॥ 
मृत्यु आदि का भय चले जाने से भगवद् भजन करना भी भूल जाता है सत्संग में भी रुचि नहीं रहती, आत्म विषयक संशय मन में नहीं होने से सद्गुरु तथा संतों की सेवा का भाव भी प्राणी के मन से चला जाता है । 
अदब२ अकलि१ में पाइये, शर्म साफ दिल माँहिं । 
बे अदबी बे शर्म में, रज्जब रजमा३ नाँहिं ॥२३॥ 
ज्ञान१ युक्त में आदर२ का भाव रहता है, साफ हृदय में लज्जा रहती है, आदर भाव से रहित और निर्ज्जल में उन्नतिप्रद योग्यता३ नहीं रहती । 
जो तन निपजा तीन करि, न नीतिगि१ साज२ । 
जन रज्जब सुत पंच का, करे कौन की लाज ॥२४॥ 
शुद्ध माता पिता से उत्पन्न होता है उसमें नीति, लज्जा, पाप कर्म से भय रहता है । जिसमें जार का बिन्दु भी पड़ा हो, वह तीन का पुत्र है उसमें नीतिज्ञ१ होने का साधन२ नहीं होता । जिसके चार जार हैं और एक पति उन पांच से उत्पन्न पुत्र किसकी लज्जा करेगा, अर्थात जो भय रहित व्यभिचारणी नारी का पुत्र हो, वह किस को पिता मान कर लज्जा करेगा ? 
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित भयभीत भयानक का अंग १४ समाप्त । सा. ५२३ ॥
(क्रमशः)

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