बुधवार, 22 नवंबर 2017

= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४-१) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४) =*
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(इस अष्टक में गुरुशिष्य के संवाद के रूप में महाकवि ने सूफीमत के सहारे से ज्ञान, भक्ति, वैराग्य का उपदेश किया है, जो बड़ा ही रोचक है । सत्रहवीं शताब्दी की उर्दू भाषा इसका माध्यम है । इसमें सूफी मत के अनुसार १. शरीयत २. तरीकत ३. मारिफत ४. और हकीकत इन चार मंजिलों, मुकामों या अवस्थाओं का वर्णन किया है और संकेत भी दे दिया जिससे तालिब(जिज्ञासु) को लाभ भी हो गया । वे लोग इन चारों अवश्ताओं या उनसे प्राप्त फलों को १. मलकूत, २. अबरूत, ३. लाहून और ४. हाहूत बोलते हैं ।)
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*= दोहा =*
*सुन्दर खोजत खोजतें, पाया मुरसिद पीर ।*
*कदम जाइ उसके गहे, देख्या अति गम्भीर ॥१॥*
(महाकवि कहते हैं --) खोज करते करते आखिर वह(जिज्ञासु) शिष्य रूप में सच्चे गुरु के पास पहुँच ही गया । पास पहुँचते ही उसने अतिशय श्रद्धा के साथ गुरु के चरण-कमलों में अपना सिर नवाया, और उन्होंने शिष्य की ओर गम्भीर दृष्टि से देखा ।(नजरों ही नजरों में अपनी गहरी मनोव्यथा गुरु के सामने रख दी ।)
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*= चामर छन्द =*
*औबलि कदम उस्ताद के मैं, गाहे दोऊ दस्त ।*
*उनि मिहर मुझपर करी ऐसी, ह्वै गया में मस्त ॥*
*जब सखुन करि मुझ को कह्या तू, बन्दिगी करि खूब ।*
*इस राह सीधा जायगा तब मिलैगा महबूब ॥१॥*
प्रारम्भ में आते ही मैंने गुरुदेव के चरणों का दोनों हाथों से श्रद्धा के साथ स्पर्श किया । उनहोंने कृपा करके मुझ पर ऐसी शीतल दृष्टि डाली कि मैं मस्त(भावविभोर) हो गया । फिर उनहोंने मुझे अपनी गम्भीर वानी में उपदेश किया कि तू भगवान् की भक्ति में तन्मयतापूर्वक(= खूब अच्छी तरह) लग जा । इसी उपाय से तूं अपने प्रिय चरम लक्ष्य मोक्ष(ब्रह्मज्ञान) को सीधे प्राप्त कर पायगा ॥१॥
(क्रमशः)

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