🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४) =*
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*तब फिरि कह्या उस्ताद सौं मैं,*
*राह यह बारीक ।*
*क्यों चले बन्दा बिगरि देखैं,*
*सबौं सौं फारीक ॥*
*अथ मिहरि करि उस राह कौं,*
*दिखलाइ दीजै पीर ।*
*मुझे तलब है उस राह की,*
*ज्यौं पिवै प्यासा नीर ॥४॥*
तब मैंने गुरुदेव से फिर निवेदन किया कि भगवन् ! आपका बताया यह मार्ग तो बहुत सुगम है, इस पर बिना बताये मुझ जैसा नादाँ(मूर्ख) कैसे चल पायगा ! आपका बताया वह मार्ग अब तक मेरे जाने उपायों में सबसे अलग है, सबसे सूक्ष्म है ।
हे गुरुदेव ! आप ही कृपा करके इस उपाय का साक्षात्कार कराइये । मुझे इस उपाय(ज्ञानामृत) को जानने के लिए उतना ही उत्सुक समझिए जितना कोई प्यासा आदमी पानी के लिए उत्सुक होता है और मिलने पर उस उत्कण्ठा के साथ पीता ही जाता है ॥४॥
(क्रमशः)

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