卐 सत्यराम सा 卐
*दादू दूजे अन्तर होत है, जनि आणै मन मांहि ।*
*तहँ ले मन को राखिये, जहँ कुछ दूजा नांहि ॥*
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साभार ~ oshoganga
जनक कहते हैं, बड़ी अदभुत घटनाएं दुनिया में घटती हैं। अचिंत्य का भी लोग चिंतन करते हैं। पूछो महात्माओं से, कहेंगे, परमात्मा अचिंत्य है. और फिर समझाएंगे कि परमात्मा की याद करो, स्मरण करो। अचिंत्य का चिंतन, क्या कहते हो? अचिंत्य का तो अर्थ ही यह हुआ कि चिंतन नहीं हो सकता। अचिंत्य का तो कोई चिंतन नहीं हो सकता।
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सब चिंतन हमसे छूट जाएं, हम चिंतन पर पकड़ न रखे, तो अचिंत्य हमे उपलब्ध हो जाए। तो परमात्मा की कोई चितना थोड़े ही करनी होती है; नहीं तो नई चिंता सवार हुई। ऐसे ही चिंताएं क्या कुछ कम हैं हम पर? ऐसे ही बोझ से दबे जाते हैं। अब इस पर और परमात्मा को बिठाने की कोशिश कर रहे हैं, आखिरी तिनका साबित होगा, बुरी तरह गिरेंगे।
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अधार्मिक आदमी चिंतित होता है, धार्मिक आदमी और बुरी तरह चिंतित हो जाता है। अधार्मिक आदमी को संसार की ही चिंता है, धार्मिक को परलोक की भी चिंता लगी है। यहां भी धन कमाना, वहा भी धन कमाना। यहां भी कुछ करके दिखाना है,वहा भी पुण्य का अर्जन कर लेना है। हम तो यहीं बैंक-बैलेंस रखते हैं, वह वहा भी रखता है। वह वहा के लिए भी हुंडिया लिखवाता है। उसकी चिंता और भी भारी हो जाती है।
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अचिंत्यं चित्यमानोउपि चितारूप भजत्यसौ।
जनक कहते हैं, लोग अचिंत्य का चिंतन कर रहे हैं, तो, मैंने तो सब चिंतन के साथ हाथ हटा लिए। अब तो मैं खाली हो गया हूं। अब तो मैं भगवान का भी चिंतन नहीं करता, क्योंकि भगवान का चिंतन हो कैसे सकता है?
त्यक्ला तद्भावन तस्मादेवमेवाहमास्थित:!
और सब छोड़ कर अपने में बैठ गया हूं।

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