卐 सत्यराम सा 卐
दुर्लभ दर्शन साध का, दुर्लभ गुरु उपदेश ।
दुर्लभ करबा कठिन है, दुर्लभ परस अलेख ॥
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साभार ~ Yogi Muktinath
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***अद्भुत गुरुभक्ति***
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एक बार सन्त दादू जी महाराज शिष्य मण्डली सहित यात्रा कर रहे थे । मार्ग में छिछले पानी वाला नाला पड़ गया, जिसमें कीचड़ भरा हुआ था । दादू जी महाराज के शिष्य उस नाले को पत्थरों से पाटने के लिए पत्थर खोजने लगे, जिससे गुरुदेव बिना कीचड़ में पैर रखे पार जा सकें । तभी रज्जब नाम का शिष्य उस छिछले नाले में जाकर लेट गया और दादू जी से आग्रह किया कि "गुरुदेव ! आप मेरे ऊपर पैर रखते हुए पार चले जाईये ।' दादू जी अपने शिष्य रज्जब के ऊपर पैर रखते हुए दूसरी पार चले गए ।
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बाद में जब दादू जी महाराज संसार छोड़ गए तो उनके वियोग में गुरुभक्त रज्जब ने अपनी आँखें ढांप लीं, ताकि वे किसी को देख न सकें । जब सन्तों ने उन्हें आँखें खोलने के लिए विवश करना चाहा तो रज्जब ने उनसे कहा - "गुरुदेव चले गए । अब मैं दुनिया में देखूँ तो किसे देखूँ ? कौन है देखने लायक ? मुझे तो अपने गुरुदेव के दर्शन की ही सदैव अभिलाषा रही है, वे नहीं रहे तो अन्य किसी को देखने की मेरी इच्छा नहीं है ।"
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सन्त रामचरण दास जी ने रज्जब के लिए ठीक ही कहा है -
*दादू जैसा गुरु मिले, शिष्य रज्जब सा जाण ।*
*एक शब्द में उद्धार, रही न खेंचातान ॥*
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सच ही दादू जी महाराज के शब्दों से रज्जब का उद्धार हो गया, क्योंकि रज्जब ने जीवन में मात्र यही चाहा कि -
"रज्जब' की अरदास यह और कहै कछु नाहिं ।
यो मन लीजै हेरि मिले, न माया माहिं' ।"
अर्थात् रज्जब की मात्र यही अरदास रही है कि "हे हरि ! आप एक बार मेरे मन को अपना लीजिये, जिससे कि मैं माया में लिप्त न रहूँ ।

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