बुधवार, 28 नवंबर 2018

= सुन्दर पदावली(१२. राग बिलावल(कायाबेली ग्रंथ ६/२ ) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
(६) 
*सौयै स्वर्ग पताल निहारै जागैं जात न दीसै रे ।* 
*षेलत फिरै बिषै बन मांहीं लीयें पांच पचीसै रे ॥२॥* 
मेरी स्वप्नावस्था में यह स्वर्ग या पाताल तक दौड़ लगाने लगता है और जाग्रदवस्था में यह दिखायी ही नहीं देता । तथा यह इधर उधर विषयभोगों में ही लिपटा रहकर पञ्च तत्त्व तथा पच्चीस इन्द्रियों के चक्र में ही फँसा रहता है ॥२॥ 
*मैं जांन्यौ मन अब थिर होई दिन दिन पसरन लागा रे ।* 
*नाना चीज धरौं ले आगैं तऊं करंक पर कागा रे ॥३॥* 
कभी मुझको भ्रम होता है कि अब मेरा मन स्थिर हो गया, परन्तु यह तो दिन रात अधिक से अधिक अपना विस्तार ही करता जाता है । इसके उपभोग के लिये मैं नाना प्रकार की भोगसामग्री इसके सम्मुख रखता हूँ; परन्तु यह कौए की तरह दुर्गन्धयुक्त शव की और दौड़ जाने की इच्छा रखता है ॥३॥ 
*ऐसे मन का कौंन भरोसा छिन छिन रंग अपारा रे ।* 
*सुन्दर कहै नहीं बस मेरा राषै सिरजन हारा रे ॥४॥* 
ऐसे इस अविश्वस्त मन पर क्या विश्वास किया जो क्षण क्षण में अपने नये रंग की विविध इच्छाएँ बदलता रहता है । महात्मा श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस पर मेरा अब कोई नियन्त्रण नहीं रह गया । अब तो इस पर भगवान् ही नियन्त्रण कर सकते हैं ॥४॥
(क्रमशः)

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