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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
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(६)
*सौयै स्वर्ग पताल निहारै जागैं जात न दीसै रे ।*
*षेलत फिरै बिषै बन मांहीं लीयें पांच पचीसै रे ॥२॥*
मेरी स्वप्नावस्था में यह स्वर्ग या पाताल तक दौड़ लगाने लगता है और जाग्रदवस्था में यह दिखायी ही नहीं देता । तथा यह इधर उधर विषयभोगों में ही लिपटा रहकर पञ्च तत्त्व तथा पच्चीस इन्द्रियों के चक्र में ही फँसा रहता है ॥२॥
*मैं जांन्यौ मन अब थिर होई दिन दिन पसरन लागा रे ।*
*नाना चीज धरौं ले आगैं तऊं करंक पर कागा रे ॥३॥*
कभी मुझको भ्रम होता है कि अब मेरा मन स्थिर हो गया, परन्तु यह तो दिन रात अधिक से अधिक अपना विस्तार ही करता जाता है । इसके उपभोग के लिये मैं नाना प्रकार की भोगसामग्री इसके सम्मुख रखता हूँ; परन्तु यह कौए की तरह दुर्गन्धयुक्त शव की और दौड़ जाने की इच्छा रखता है ॥३॥
*ऐसे मन का कौंन भरोसा छिन छिन रंग अपारा रे ।*
*सुन्दर कहै नहीं बस मेरा राषै सिरजन हारा रे ॥४॥*
ऐसे इस अविश्वस्त मन पर क्या विश्वास किया जो क्षण क्षण में अपने नये रंग की विविध इच्छाएँ बदलता रहता है । महात्मा श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस पर मेरा अब कोई नियन्त्रण नहीं रह गया । अब तो इस पर भगवान् ही नियन्त्रण कर सकते हैं ॥४॥
(क्रमशः)

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