🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू जे जे चित बसै, सोई सोई आवै चीति ।*
*बाहर भीतर देखिये, जाही सेती प्रीति ॥*
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साभार ~ Soni Manoj
जो जहां भी है । समर्पित है सत्य को । ये फूल और यह धूप, लहलहाते खेत, नदी का कूल क्या प्रार्थनाएं नहीं हैं । यह व्यक्तित्व निवेदित ऊर्ध्व के प्रति क्या नहीं है ? गौर से देखना फूल को वृक्ष पर - वृक्ष की प्रार्थना है । यह वृक्ष का ढंग है प्रार्थना करने का । आदमी ही थोड़े प्रार्थना करता है । तुम तभी मानोगे जब वृक्ष जाएगा मंदिर में और गंगाजल चढ़ाएगा ? तभी तुम मानोगे ? जब वृक्ष पानी भर कर लाएगा और शंकर जी पर चढ़ाएगा, तभी तुम मानोगे ? और वृक्ष रोज अपने फूल झराता रहा शंकर पर, अपने पत्ते गिराता रहा, अपने प्राणों से पूजा करता रहा, इसे तुम स्वीकार न करोगे ? जो जहां है .... ।
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जो जहां भी है समर्पित है सत्य को । ये फूल और ये धूप, लहलहाते खेत, नदी का कूल क्या प्रार्थनाएं नहीं हैं ? प्रार्थनाएं अलग-अलग होंगी, अलग-अलग ढंग हैं वैविध्य है जगत में । और सुंदर है जगत - वैविध्य के कारण ।
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तो जब मुसलमान मस्जिद में झुके तो तुम यह मत सोचना कि गलत है । और मंदिर में जब हिंदू घंटियां बजाए तो तुम नाराज मत होना । और चर्च में जब ईसाई गुनगुनाए या बौद्ध अपने पूजागृह में बैठ कर ध्यान करे, तो तुम जानना : जो जहां है, वहीं समर्पित है सत्य को । और धूप और फूल भी प्रार्थना कर रहे हैं । सारा जगत प्रार्थना-मग्न है । झरने अपना गीत गुनगुना रहे हैं । स्त्रियां स्त्रियों के ढंग से जाएंगी, पुरुष पुरुष के ढंग से जाएंगे । और एक बार तुम्हें यह समझ में आ जाए कि मेरा ढंग मुझे खोज लेना है तो तुम दूसरी बात छोड़ दोगे, तुम दूसरों को घसीटने की आदत छोड़ दोगे ।
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दुनिया में बड़ा अहित हुआ है । पत्नी जिस मंदिर में जाती है, पति को भी ले जाती है । बाप जिस मंदिर में जाता है, बेटे को भी ले जाता है, इससे दुनिया में इतना अधर्म है । क्योंकि लोगों को स्वभाव के अनुकूल सुविधा नहीं है । मैंने वर्षों घूम कर देश में देखा । किसी को पाया जैन घर में पैदा हुआ है, वह उसका दुर्भाग्य हो गया । उसके पास हृदय था भक्ति का, लेकिन जैन घर में भक्ति के लिए कोई उपाय नहीं । वहां तो ध्यान की ही गूंज, एकमात्र गूंज है । किसी को मैंने देखा कि भक्ति के पंथ में पैदा हो गया है, वल्लभ संप्रदाय में पैदा हो गया है; लेकिन उसका कोई रस भक्ति में नहीं है ।
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ध्यान से सुगंध उठती , लेकिन ध्यान से दुश्मनी है पैदाइश के कारण । कहीं पैदाइश से कोई धर्म होता है ? स्वभाव से धर्म होता है । स्वभाव यानी धर्म । पैदाइश तो सांयोगिक घटना है । तुम किस घर मैं पैदा हुए, इससे थोड़े ही धर्म तय होता है ! दुनिया अगर सच में धार्मिक होना चाहती हो, तो हमें बच्चों को धर्म में जबर्दस्ती प्रवेश करवाने की पुरानी प्रवृत्ति छोड़ देनी चाहिए ।
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हमें बच्चों को, सारे द्वार खुले छोड़ देने चाहिए । उन्हें कभी मस्जिद भी जाने दो, कभी मंदिर भी, कभी गुरुद्वारा भी । उन्हें खोजने दो । सिर्फ उन्हें तुम एक रस दे दो कि खोजना है परमात्मा को, बस इतना काफी है । फिर तुम कैसे खोजो - कुरान से तुम्हें धुन मिलेगी कि गीता से - तुम्हारी मर्जी । पहुंच जाना परमात्मा के घर । कुरान की आयत दोहराते पहुंचोगे कि गीता के मंत्र पाठ करते, कुछ लेना-देना नहीं । तुम पहुंच जाना, अटक मत जाना कहीं ।
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शुभ होगा वह दिन, जिस दिन एक ही घर में कई धर्मों के लोग होंगे - पत्नी मस्जिद जाती, पति गुरुद्वारा जाता, बेटा चर्च में । और जब तक ऐसा न हो जाए, तब तक दुनिया में धर्म नहीं हो सकता, असंभव है । क्योंकि धर्म का पैदाइश से कोई भी संबंध नहीं है । तो तुम अपनी खोज करो । मेरे पास जो लोग हैं, यही मेरी देशना है उन्हें । इसलिए मैं सब पर बोल रहा हूं । तुम कभी-कभी चौंकते हो ।
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मेरे पास लोग आते हैं । वे कहते हैं, आप एक ही धारा पर बोलें, तो हम निश्चिन्त हो कर लग जाएं काम में । कभी आप भक्ति पर बोलते हैं, कभी आप ज्ञान पर बोलते हैं । कभी आप कहते हैं, डूब जाओ; कभी कहते हैं, साक्षी हो जाओ; कभी अष्टावक्र, कभी नारद -
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हम बड़ी बिबूचन में पड़ जाते हैं । तुम बिबूचन में मेरे बोलने के कारण नहीं पड़ रहे हो क्योंकि तुम अभी तक यह नहीं पहचान पाए कि रस क्या है ? तुम्हें अपना रस समझ में आ जाए इसलिए बोल रहा हूं । ये सारे शास्त्र तुम्हारे सामने खोल रहा हूं कि तुम्हें अपना रस पहचान में आ जाए । इसलिए बोल रहा हूं इतने पर, क्योंकि मेरी मान्यता है कि दुनिया में जितने मार्ग हैं, उतने ही तरह के लोग हैं ।
💮 ओशो 💮
अष्टावक्र महागीता
भाग ३ प्रवचन ६ से संकलन ।
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अष्टावक्र महागीता
भाग ३ प्रवचन ६ से संकलन ।
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