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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
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*चंद सूर पावक पवन, पाणी का मत सार ।*
*धरती अंबर रात दिन, तरुवर फलैं अपार ॥*
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साभार ~ Gyan Aur Bhakti
मनुष्य-जीवन ईश्वरीय उपहार है। अतः अपने वास्तविक स्वरूप का बोध और जीवन के प्रयोजन की पूर्ति ही जीवन का लक्ष्य हो; यही परम पुरुषार्थ है...! श्रीमद्भावतगीता को अध्यात्म दीप कहा गया है, इसकी फलश्रुति ही अध्यात्म है। अध्यात्म का अर्थ है - स्वभाव की और लौटना। "स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते"... । हमारी संस्कृति की जड़ें ही अध्यात्म है। अध्यात्म का अर्थ है - अपने स्वभाव में लौटना। अध्यात्म अपने स्वभाव में लौटने की यात्रा का नाम है। जहां शांति, आनन्द और स्थाई समाधान है।
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अध्यात्म भीतर की उर्जा को, स्वयं की आग को जगाता है। यह बताता है कि कैसे विषम और प्रतिकूल परिस्थितियों में बड़ा बना जाएं? स्वयं का बाहरी विकास विज्ञान है और भीतरी विकास अध्यात्म है। अध्यात्म की प्रेरणा भी पूरी वसुधा को एक परिवार मान कर चलने की है। बहिर्जगत में विज्ञान ने दुनिया को एक सूत्र में आबद्ध करने का आधार प्रस्तुत किया है तो अंतर्जगत में वही प्रयोजन अध्यात्म पूरा करता है। अध्यात्म के बिना विज्ञान अधूरा है।
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जीवन की स्वाभाविक मांग अध्यात्म है। जब उसकी पूर्ति होने लगती है, तब सहसा प्रसन्नता, आनंद, उल्लास, जीवन में धन्यता, उत्सव-धर्मिता, स्थायित्व, प्रसन्नता आदि अनुभूत होने लगती हैं। जिसके आने पर भ्रम-भय नहीं रहता, शोक नहीं रहता, फिर द्वंद भी कहाँ रहता है। हानि-लाभ, जन्म-मरण, यश-अपयश इन द्वंदों से ऊपर उठना ही अध्यात्म है। जो चेतना को प्रसादिक बना दे, वही तो अध्यात्म है। अध्यात्म स्वभाव का नाम है। जो हमें स्वभाव की ओर, अपने अस्तित्व की ओर, अपनी सत्ता की ओर ले आए, उसे अध्यात्म कहते हैं।
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महापुरुषों के उपदेश ठीक तरह से सुनना आ जाए तो जीवन की शंकायें स्वमेव ही समाप्त हो जाएंगी। आत्म-तत्त्व के दर्शन, जागरण और समुन्नयन के लिए चार सोपान अति आवश्यक हैं - आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास। जीवन को सही दिशा में ले जाने का प्रयास तो हम सभी करते हैं, लेकिन यदि हम महापुरुषों के बताए दिशा-निर्देशों के अनुरूप चलें तो सम्भव है, हमारा जीवन सार्थक बन जाए।
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आध्यात्मिक चिन्तन के अंतर्गत व्यक्ति को एकमात्र अतीन्द्रिय स्वरूप अनुसंधान के उद्देश्य को प्राप्त करने का संदेश दिया गया है। जिससे प्रत्येक मनुष्य अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता, संतुष्टि तथा शांति को प्राप्त करते हुए श्रेष्ठ जीवन जीने की कला सीख जाए। मनुष्य के भ्रम, भय, संदेह, तर्क-वितर्क और समस्याओं को अध्यात्म के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। अध्यात्म भारतीय संस्कृति के प्राण हैं और भारतीय संस्कृति तो समूची वसुधा के प्राण हैं।

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