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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
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(९)
*है कोई योगी साधै पौंना ।*
*मन थिर होइ बिंद नहिं डोलै, जितेंद्री सुमरै नहिं कौंना ॥टेक॥*
जैसा कोई सिद्ध योगी ही है जो अपनी प्राण वायु को ऐसा सिद्ध कर सके कि उसका चित्त भी स्थिर हो जाय और वीर्य बिन्दु भी क्षरित न हो । इस प्रकार, वह जितेन्द्रिय होकर सांसारिक भोगों का स्मरण भी नहीं कर पाये ॥टेक॥
*यम अरु नेम धरै दृढ आसन, प्राणायाम करै मन मौंना ।*
*प्रत्याहार धारणा ध्यानं, लै समाधि लावै ठिक ठौंना ॥१॥*
वह योगाभ्यास करता हुए यम एवं नियमों की शिक्षा ले । तदनुसार उसमें बताये प्राणायाम का अभ्यास, मौन रहता हुआ, करे । तब उसके बाद की विधि में बोधित उपाय-प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, लय, समाधि आदि का शास्त्रानुसार शिक्षण ले ॥१॥
(क्रमशः)

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