बुधवार, 5 दिसंबर 2018

= समर्थता का अंग ५१(२१/२४) =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार ।*
*पंचों का रस नाद है, दादू बोलणहार ॥* 
===============
**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*समर्थता का अंग ५१*
.
घड़ै विनाशै सकल में, अनन्त लोकि अवगत्त१ । 
थापि२ उथापै३ सांइयाँ, जन रज्जब सब सत्त ॥२१॥ 
वह परमात्मा१ अनन्त लोकों में व्यापक रहकर सबको बनाते हैं तथा नष्ट करते हैं बैठाते२ हैं तथा उठाते३ हैं, उनके लिये यह सब करना सत्य ही है ।
ब्रह्माण्ड पिंड बादल मयी, करि न विनाशत बेर । 
रज्जब हूनर१ हद२ हुई, करन हरन दिशि हेर३ ॥२२॥ 
ब्रह्माण्ड तथा शरीर बादल के समान हैं, वा ब्रह्माण्ड के शरीर बादल के समान हैं, जैसे बादल को बनते बिगड़ते कुछ भी देर नहीं लगती, वैसे ही उन प्रभु को ब्रह्माण्ड तथा शरीर को बनाकर नष्ट करते कुछ भी देर नहीं लगती । देख३, उनकी उत्पन्न करने और नष्ट की कला को, इस कला१ की अन्तिम सीमा२ उन्हीं में हुई है अर्थात यह कला अन्य में ऐसी नहीं है ।
अकल१ अकलि२ परि सब धर्या, ओंकार आकार । 
रज्जब रचना अगह३ गति, नमो निपावनहार ॥२३॥ 
कला-विभाग-रहित१ उन प्रभु ने महतत्त्व रूप अपनी बुद्धि२ पर सबको धर रखा है, ओंकार से आदि जो भी आकारों की रचना उनने की है, उनकी वास्तविक स्थिति४ जानना मानव की बुद्धि से अग्राह्य३ है, जिनकी ऐसी अद्भुत शक्ति है, उन सृष्टिकर्त्ता५ प्रभु को हम नमस्कार करते हैं । 
हिकमत१ की घड़ियाल२ घट, दीवा धरीसु देह । 
तीनों आतम की अकलि३, रज्जब अचरज येह ॥२४॥ 
समय मापने का यंत्र२, घट और दीपक बनाना कला-कौशल१ की ही बात है, उक्त तीनों जीवात्मा की बुद्धि३ से ही बनते हैं किन्तु जीवात्मा ने देह धारण किया है, उस देह को बनाना यह उन प्रभु की निर्माण बुद्धि आश्चर्य रूप है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें