बुधवार, 5 दिसंबर 2018

= १९९ =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*सत्संग नित प्रति कीजिये,*
*मति होय नर्मल सार रे,*
*रुचि प्राण पति सौं उपजे,*
*अति लहहिं सुख अपार रे ।*
*मुख नाम हरि हरि उच्चरे,*
*श्रुति सुणत गुण गोविन्द रे,*
*रट ररंकार अखंड धुनि,*
*तहं प्रकट पूरण चन्द्र रे ।*
*सतगुरु बिना नहीं पाइए,*
*ये अगम उलटो खेल रे,*
*कहे दास "सुंदर" देखतां,*
*होय जीव ब्रह्म ही मेल रे ॥*
=================
साभार ~ Gyan Aur Bhakti

सत्संग, सन्त-सन्निधि और शास्त्र-विचार का फलादेश है- अन्त:करण निर्मलता, अभयता एवं लक्षपूर्ति की तत्परता...!
.
मनुष्य के जीवन में सत्संग का विशेष महत्व है। सत्संग एक प्रकार का औषधालय है, जो आत्मा का उपचार करता है। जिस प्रकार एक रोगी व्यक्ति शारीरिक उपचार के लिए चिकित्सक के पास जाता है, उसके परामर्श के अनुसार नियमित दवा का सेवन कर रोग से छुटकारा पता है। ठीक उसी तरह सद्गुरु के परामर्श से जो व्यक्ति नियमित सत्संग करता है, उसकी आत्मा की मलीनता का धीरे-धीरे नाश हो जाता है।
.
इस भौतिकतावादी सांसारिक वातावरण में रहते हुए मनुष्य की मनोदशा तथा बौद्धिक स्थिति मलीन हो जाती है। इसके शुद्धिकरण के लिए पूर्ण सद्गुरू की शरण ग्रहण कर मनुष्य सत्संग को नियमित कर आत्मिक शुद्धता को प्राप्त करता है।
.
नियमित सत्संग करने से मानव के कुविचारों और कुसंस्कारों का नाश होता है तथा उसके मन बुद्धि में सुविचारों तथा अच्छे संस्कारों का संचार होता है। विचार की शुद्धता के परिणाम स्वरूप मनुष्य की वाणी पवित्र होती है तथा आचरण व्यवहार संतों, सत्पुरुषों के समान पवित्र हो जाता है..।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें