सोमवार, 10 दिसंबर 2018

= ९ =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*काल गिरासे जीव को, पल पल श्वासैं श्वास ।*
*पग पग मांहि दिन घड़ी, दादू लखै न तास ॥*
===========================
साभार ~ Gyan Aur Bhakti

सृष्टि में हर पल परिवर्तन है। प्रभात-दोपहर, सायं-रात्रि, दिवस-सप्ताह, मास-अयन, संवत, विविध ऋतु-चक्र सर्वत्र विद्यमान दृश्य-सत्ता और सम्पूर्ण प्राणि-जगत् कालमुख ग्रास है। अतः परमार्थ, भगवद-भजन एवं स्वयं की अविनाशी, नित्य-शाश्वत स्वरूप-सत्ता का प्रबोध ही श्रेयस्कर है...! 
.
संसार के सब सम्बन्ध नश्वर हैं, केवल आत्मा के साथ सम्बंध ही शाश्वत है। यह संसार क्षणभंगुर है, नाशवान है। मनोहर दिखाई देने वाला प्रत्येक पदार्थ प्रतिक्षण विनाश की प्रक्रिया से गुजर रहा है। जो कल था, वह आज नहीं है और जो आज है, कल नहीं होगा। 
.
संसार प्रतिक्षण नाशवान और परिवर्तनशील है। फिर हम क्यों बाह्य पदार्थों, जड़ तत्त्वों में भटक रहे हैं? क्यों हम नश्वरता के पीछे बेतहाशा दौडे जा रहे हैं? हम आत्म-स्वरूप को समझकर शाश्वत सुख की ओर क्यों न बढें? जहां जीना थोड़ा, जरूरतों का पार नहीं, फिर भी सुख का नामोनिशान नहीं; ऐसा है संसार और जहां जीना सदा, जरूरतों का नाम नहीं, फिर भी सुख का शुमार नहीं; वह है मोक्ष ! फिर भी हमारी सोच और गति संसार से हटकर मोक्ष की ओर नहीं होती, यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है? 
.
हम अनन्त काल से संसार की क्षणभंगुरता को समझे बिना परभाव में रमण करते चले आ रहे हैं, यही हमारे जन्म-मरण और संसार परिभ्रमण का कारण है, यही दुःख-शोक-विषाद का कारण है। हर पल हम परभाव में व्यस्त रहते हैं, एक क्षण के लिए भी यह विचार नहीं करते कि हम आत्मा के लिए क्या कर रहे हैं? जो भी आत्मा से ‘पर’ है, वह नाशवान है और संसार के नाशवान पदार्थ ही सब रगड़े झगडों की जड़ हैं; जब तक यह चिन्तन नहीं बनेगा, संसार से आसक्ति समाप्त नहीं होगी, हम स्व-बोध को, आत्म-बोध को प्राप्त नहीं कर सकेंगे और उसके बिना आत्मिक आनंद, परमसुख की उपलब्धि असम्भव है...।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें