॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*पारिख का अँग २७*
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पारिख अपारिख
हीरे को कंकर कहैं, मूरख लोग अजान ।
दादू हीरा हाथ ले, परखैं साधु सुजान ॥२५॥
२५ में परीक्षक अपरीक्षक का परिचय दे रहे हैं, अनजान हीरे को कंकर कहकर पटक देता है किन्तु
जौहरी उसकी परीक्षा करके अपनाता है । वैसे ही मूर्ख लोग सँतों के शब्दों को न
समझने के कारण "कुछ नहीं" कह कर छोड़ देते हैं किन्तु बुद्धिमान् साधक
सँत उनको अन्त:करण रूपी हाथ में लेकर उनकी यथार्थ जानना रूप परीक्षा करके अपनाते
हैं ।
सगुरा - निगुरा
सगुरा निगुरा परखिये, साधु कहैं सब कोइ ।
सगुरा साचा, निगुरा
झूठा, साहिब के दर होइ ॥२६॥
२६ - २७ में गुरु उपदेश युक्त हृदय सगुरा होता है इसका परिचय दे
रहे हैं, सभी सँत कहते हैं, गुरु उपदेश सहित हृदय सगुरा और उपदेश से रहित हृदय निगुरा की परीक्षा करके
सगुरा से ही व्यवहार रखना चाहिये । परमात्मा के दरबार में सगुरा सच्चा और निगुरा
झूठा सिद्ध होता है ।
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सगुरा सत सँयम रहे, सन्मुख सिरजनहार ।
निगुरा लोभी लालची, भूँचे१ विषय विकार ॥२७॥
सगुरा व्यक्ति सत्य - व्यवहार और सँयम के द्वारा ईश्वर के
सन्मुख रहता है । निगुरा द्रव्य का लोभी और विषयों का लालची होता है और कामादि
विकारों में पड़ा रह कर विषयों को ही भोगता१ रहता है ।
(क्रमशः)

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