बुधवार, 5 दिसंबर 2018

= सुन्दर पदावली(१२. राग बिलावल(कायाबेली ग्रंथ १०/२) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
(१०) 
*बोध संन्यासी बापुरे लीये अभिमाना ।* 
*सेष समाइक दीनका उनि कलमा ठाना ॥३॥* 
उधर, बेचारे(शास्त्रज्ञान से निर्धन) बौद्ध संन्यासी अपने ही मत के अभिमान में उन्मत्त थे, मूसापन्थी शेखों ने अपने साम्प्रदायिक मत का भगवत्प्राप्ति उपाय ग्रहण कर रखा था ॥३॥ 
*बडे अवलिया यौं कहैं हमही निज बंदा ।* 
*बन बासी बन सेइ कैं षनि षाये कंदा ॥४॥* 
हम बड़े औलिया(सिद्ध) से मिले तो उनने अपना ही राग अलाप दिया कि हम किसी को नहीं मानते । हम अपनी ही साधना करते हैं । 
वनवासी सिद्ध तो वन में रहकर वन के कन्द, मूल, फल, फूल खाते हुए मिले ॥४॥ 
*अपने अपने पंथ मैं सब दरसन राता ।* 
*जन सुन्दर रस राम कै कोई बिरला माता ॥५॥* 
सभी सम्प्रदाय वाले अपना अपना साम्प्रदायिक राग ही अलापते मिले । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इन उपर्युक्त सम्प्रदायों का कोई विरला सन्त भी हमें राम के रस मग्न हुआ नहीं मिला ॥५॥
(क्रमशः)

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