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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
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(१०)
*बोध संन्यासी बापुरे लीये अभिमाना ।*
*सेष समाइक दीनका उनि कलमा ठाना ॥३॥*
उधर, बेचारे(शास्त्रज्ञान से निर्धन) बौद्ध संन्यासी अपने ही मत के अभिमान में उन्मत्त थे, मूसापन्थी शेखों ने अपने साम्प्रदायिक मत का भगवत्प्राप्ति उपाय ग्रहण कर रखा था ॥३॥
*बडे अवलिया यौं कहैं हमही निज बंदा ।*
*बन बासी बन सेइ कैं षनि षाये कंदा ॥४॥*
हम बड़े औलिया(सिद्ध) से मिले तो उनने अपना ही राग अलाप दिया कि हम किसी को नहीं मानते । हम अपनी ही साधना करते हैं ।
वनवासी सिद्ध तो वन में रहकर वन के कन्द, मूल, फल, फूल खाते हुए मिले ॥४॥
*अपने अपने पंथ मैं सब दरसन राता ।*
*जन सुन्दर रस राम कै कोई बिरला माता ॥५॥*
सभी सम्प्रदाय वाले अपना अपना साम्प्रदायिक राग ही अलापते मिले । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इन उपर्युक्त सम्प्रदायों का कोई विरला सन्त भी हमें राम के रस मग्न हुआ नहीं मिला ॥५॥
(क्रमशः)

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