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अध्यात्म उपनिषद ...ओशो(प्रवचन--05)
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*कछु न कहावै आपको, काहू संग न जाइ ।*
*दादू निरपख ह्वै रहै, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥*
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साभार ~ Mudit Mishra
गुरजिएफ एक बहुत अदभुत फकीर हुआ। उसकी दादी मरणशथ्या पर पड़ी थी। और गुरजिएफ ने अपनी दादी से पूछा कि तेरे जीवन के अनुभव और निष्कर्षों से अगर कोई बात मुझे देने योग्य हो और मेरी कोई पात्रता हो, तो मुझे दे दे। बड़ी अजीब बात उसकी की दादी ने दी।
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उसकी की दादी ने कहा, एक बात का अगर तू खयाल रख सके जीवन भर, कि जैसा दूसरे करते हों वैसा कभी मत करना। कोई भी काम, जैसा दूसरे करते हों वैसा कभी मत करना, सदा कोशिश करना कुछ अन्यथा करने की। गुरजिएफ ने तो इसके ऊपर बाद में एक पूरा का पूरा फलसफा, एक पूरा दर्शन खड़ा किया। और उसने एक नियम बनाया, दि ली ऑफ अदरवाइज; हमेशा और ढंग से करना।
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गुरजिएफ ने इसकी चेष्टा की, और एक अनूठा आदमी पैदा हुआ। क्योंकि जैसा दूसरे करते हों वैसा मत करना, बड़े परिणाम हुए इसके। पहला परिणाम तो यह हुआ कि जैसा दूसरे करते हैं अगर आप वैसा ही करें, तो ही आपके अहंकार को पुष्टि मिलती है। तो आपके अहंकार को पुष्टि देने वाला कोई भी नहीं मिलेगा। लोग आप पर हंसेंगे।
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गुरजिएफ ने कहा है कि मेरी दादी ने मुझसे कहा कि मैं मरने के करीब हूं मुझे पता भी नहीं चलेगा कि तूने मेरी बात मानी कि नहीं मानी ! तो मरने के पहले मुझे तू उदाहरण एक करके दिखा दे। पास ही पड़ा था एक सेव, उसकी बूढ़ी दादी ने उसे दिया और कहा, इसे खाकर बता ! लेकिन याद रख, जैसा दूसरे करते हैं, वैसा मत करना।
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बड़ी मुश्किल में पड़ गया होगा वह बच्चा, क्या करे? लेकिन बच्चे इन्वेंटिव होते हैं, काफी आविष्कारक होते हैं। अगर मां—बाप उनके आविष्कार की बिलकुल हत्या न कर दें तो इस दुनिया में बहुत आविष्कारक लोग हों। लेकिन आविष्कार खतरा मालूम पड़ता है, क्योंकि नया कुछ उपद्रव लाता है।
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गुरजिएफ ने पहले कान से लगा कर उस सेव को सुना, आँख के पास लाकर देखा, चूमा, हाथ से स्पर्श किया आँख बंद करके; उस सेव को लेकर नाचा, उछला, कूदा, दौड़ा; फिर उस सेव को खाया। उसकी दादी ने कहा, मैं आश्वस्त हूं !
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फिर गुरजिएफ ने कहा, यह मेरी जिंदगी का नियम हो गया कि कुछ भी काम करो, दूसरे जैसा न करना; कुछ न कुछ अपने जैसा करना। लोग उस पर हंसते थे। लोग कहते, पागल है ! लोग कहते, यह किस तरह का आदमी है ! यह क्या कर रहा है ?' सेव को कान से सुन रहा है !
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गुरजिएफ ने कहा कि मुझे पता भी नहीं था, लेकिन इसका एक परिणाम हुआ कि मुझे दूसरों की चिंता न रही। दूसरे क्या कहते हैं, दूसरों का क्या मंतव्य है, दूसरे मेरे संबंध में क्या धारणा बनाते हैं, यह बात ही छूट गई; मैं अकेला ही हो गया; मैं निपट अकेला हो गया इस पूरी पृथ्वी पर।
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और गुरजिएफ ने लिखा है, इस कारण मुझे वह मुसीबत कभी नहीं झेलनी पडी जो सभी को झेलनी पड़ती है। एक झूठा केंद्र मेरा निर्मित ही नहीं हुआ। और मुझे अहंकार मिटाने के लिए कभी कोई चेष्टा नहीं करनी पड़ी। वह बना ही नहीं।
अध्यात्म उपनिषद ...ओशो(प्रवचन--05)
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