#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*सुन्दरी का अँग*
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नैन बैन कर वारणै, तन मन पिंड पराण ।
दादू सुन्दरि बलि गई, तुम पर कंत सुजान ॥१९॥
मेरे हृदय को अच्छी प्रकार जानने वाले स्वामिन् ! मैं जीवात्मा - सुन्दरी अपने नेत्र, वचन, मन, प्राणादि सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर आप पर निछावर करके आपकी बलिहारी जाती हूं ।
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तन भी तेरा मन भी तेरा, तेरा पिंड पराण ।
सब कुछ तेरा तूँ है मेरा, यहु दादू का ज्ञान ॥२०॥
मेरे मन, प्राणादि सूक्ष्म शरीर तथा स्थूल शरीरादि सब आपके ही हैं और आप मेरे हैं, यही मेरा ज्ञान है ।
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सुन्दरि मोहै पीव को, बहुत भाँति भरतार ।
त्यों दादू रिझवे राम को, अनन्त कला करतार ॥२१॥
जैसे सुन्दरी अपने पति को नाना शृंगार और सेवादि से अपने में अनुरक्त करती है, वैसे ही विश्व - रचयिता अपने स्वामी राम को हम अनन्त साधना रूप कलाओं से रिझाते हैं ।
(क्रमशः)

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