मंगलवार, 29 जनवरी 2019

परिचय का अंग ११६/१२०


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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि ::
कामधेनु दुहि पीजिए, अकल अनूपम एक ।
दादू पीवे प्रेम सौं, निर्मल धार अनेक ॥११६॥
यह ब्रह्म षोडश कलाओं से रहित है । “यह ब्रह्म कलातीत है, उपमा रहित है” क्योंकि उसकी कोई उपमा नहीं दी जा सकती - ऐसा श्रुति कहती है । “सजातीय विजातीय भेद शून्य एक है”- ऐसा श्रुति-वाक्य है, अत: वह एक है । तथापि अज्ञानियों को समझाने के लिये कामधेनु से उसकी उपमा दी जा रही है । जैसे कामधेनु संकल्पमात्र से सभी प्रयोजन सिद्ध करने वाली है, वैसे ही ब्रह्म भी ध्यानपरायण साधक को सब कुछ देने वाला है । जैसे कामधेनु दुहने से दूध देती है, वैसे ही ब्रह्म भी ध्यान करने पर ब्रह्म दर्शन रूप दूध देता है । महाराज श्रीदादूदयाल जी कहते हैं कि मैं तो अनेक साधनों द्वारा ब्रह्मानन्दरूपी प्रेमरस का पान करता हूँ, हे साधक ! तुम भी ऐसा ही करो ।
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कामधेनु दुहि पीजिए, ताकूँ लखे न कोइ ।
दादू पीवै प्यास सौं, महारस मीठा सोइ ॥११७॥
ब्रह्म एक कामधेनु है । जिसका समाधि में दर्शन रूप महारस तथा मधुर दूध है । उसका का पान समाधि में ब्रह्माकार वृत्ति से करो । उस ब्रह्मरस को पीने के लिये प्यास की आवश्यकता है, क्योंकि प्यास के बिना उस मधुरतम रस को भी कोई नहीं पीता ।
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कामधेनु दुहि पीजिए, अलख रूप आनंद ।
दादू पीवै हेत सौं, सुषमन लागा बंद ॥११८॥
उस रस का पान जब समाधि में मन सहित प्राणों का निरोध होने पर, सुषुम्ना द्वारा सहस्त्रारचक्र में होता है ।
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कामधेनु दुहि पीजिए, अगम अगोचर जाय ।
दादू पीवै प्रीति सूं, तेज पुंज की गाय ॥११९॥
अत: ब्रह्म कामधेनु है । वह कामधेनु अलख, आनन्दरूप, आगमातीत, वाणी व मन की भी अविषय, स्वयंप्रकाश एवं तेजोमयी है । उसका अभेदबुद्धि से दर्शन ही दूध है ।
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कामधेनु करतार है, अमृत सरवै सोइ ।
दादू बछरा दूध कौं, पीवै तो सुख होइ ॥१२०॥
जिज्ञासु बछड़ा(वत्स) है । प्रेम से उसका दुग्धपान करने से साधक को सुख होता है ।
(क्रमशः)

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