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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ महामंडलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज,श्री दादूद्वारा बगड,झुंझुनू ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि ::
अमृत धारा देखिए, पारब्रह्म वर्षतं ।
तेज पुंज झिलमिल झरै, को साधू जन पीवंत ॥१११॥
समाध्यवस्था में परब्रह्म परमात्मा के दर्शन से आनन्द की धारा बरसने लगती है । उस स्थिति में ब्रह्म तेजोमय रूप से नक्षत्रों की झिलमिलाहट की तरह चमकता है । ऐसा समाधि सुख, किसी अतिदुर्लभ भाग्यशाली साधक को ही देखने को मिलता है ।
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रसही मैं रस बरषि है, धारा कोटि अनंत ।
तहँ मन निश्चल राखिये, दादू सदा वसंत ॥११२॥
जिस भक्त के हदय में प्रभु प्रेम की धारा प्रवाहित होने लगती है, उसी के चित्त में दर्शनानन्द का प्रवाह स्वच्छन्दतया प्रवाहित होने लगता है । हे साधक ! तुम भी अपने चित्त को परमात्मा में स्थिर करो । तुम्हारे चित्त में भी दर्शनानन्द स्फुरित होने लगेगा ।
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घन बादल बिन बरषि है, नीझर निर्मल धार ।
दादू भीजे आतमा, को साधू पीवण हार ॥११३॥
निर्विकल्प समाधि में मेघ के विना ही ब्रह्ममेघ से दर्शनरूपी वर्षा की धारा निरन्तर प्रवाहित होने लगती है । वहाँ साधक दर्शनरूपी स्नान में डूबकर परम शान्ति का अनुभव करता है ।
योगवासिष्ठ में :: “योग के ज्ञाता योगियों ने इस समाधि को ‘धर्ममेघ’ समाधि कहा है । और धर्ममेघ भी हजारों धर्मरूपी अमृतधाराओं को बरसाता है । निर्विकार होने पर मन की एक ब्रह्माकार वृत्ति बनती है, इस वृत्ति से सब का विस्मरण हो जाता है । अत: ज्ञानपक्ष में वृत्ति को सर्वथा भूल जाना ही समाधि है । ध्याता, ध्यान और ध्येय - इन सब को त्याग कर केवल ध्येयाकार वृत्ति ही समाधि है । इस में चित्त निर्वात दीपक की तरह सर्वथा स्थिर हो जाता है ।”
हठयोगदीपिका में लिखा है :: योगी पादतल से मस्तक पर्यन्त देह को चन्द्रमा से निकलने वाले अमृत का सेवन करे तो, उस का शरीर बली पराक्रमी बन जाता है । अर्थात् अमृत स्नान से शुद्ध हो जाता है ।
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ऐसा अचरज देखिया, बिन बादल बरषे मेह ।
तहँ चित चातक ह्वै रह्या, दादू अधिक सनेह ॥११४॥
निर्विकल्पक समाधि-दशा में महान् आश्चर्य यह दीखता है कि बिना मेघों के ही ब्रह्ममेघ से दर्शनवृष्टि प्रतिक्षण होती रहती है । फिर भी चातक पक्षी स्वाति नक्षत्र का जल पीने के लिये जैसे लालायित रहता है, वैसे ही मेरा मन भी ब्रह्म दर्शन हेतु पिपासाकुल रहता है । मेरी दर्शन की प्यास बढ़ती ही जाती है और उसी तरह स्नेह भी बढ़ता जाता है ।
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महा रस मीठा पीजिए, अविगत अलख अनंत ।
दादू निर्मल देखिए, सहजै सदा झरंत ॥ ११५॥
“वह ब्रह्म स्वरूप है । उस रस को प्राप्त कर साधक आनंदित होता है ।” इत्यादि श्रुतियों के अनुसार ब्रह्म ‘महारस’ सिद्व होता है । अतः यहाँ ‘महारस’ शब्द से ब्रह्म का व्यपदेश है । वह मधुर होने से आस्वाद योग्य है । और अनंत होने से इंद्रियातीत है । वासनारहित होने से निर्मल है । ‘वासना’ ही ‘मल’ कहलाता है । उस रस का समाधि में स्फुरण होता रहता है ।
लिखा है :: समाधि द्वारा सुंदर शुद्धान्त:करण वाले को तथा समाधि निष्ठ चित्त वाले को सुख प्राप्त होता है उसका वाणी द्वारा वर्णन नहीं हो सकता । किंतु आनंद स्वयं ही अपने अंतःकरण से ही जाना जा सकता है ।
श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है :: परमेश्वर की प्राप्ति के अतिरिक्त उससे अधिक दूसरा लाभ नहीं मानता । जिस अवस्था में योगी बहुत बड़े दु:ख से भी चलायमान नहीं होता ।
(क्रमशः)

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