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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ महामंडलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज,श्री दादूद्वारा बगड,झुंझुनू ।
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ Tapasvi Ram Gopal
(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)
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संतशिरोमणि महर्षि श्रीदादू दयाल जी महाराज कहते हैं कि ::
तरुवर शाखा मूल बिन, उत्पति परले नाँहि ।
रहिता रमता राम फल, दादू नैनहुँ माँहि ॥१२५॥
वह ब्रह्मवृक्ष उत्पत्ति-विनाश से रहित ही वर्णित हुआ है । तथा माया और उसके कार्य से भी रहित है । “जैसे वृक्ष के फूल पत्ते नष्ट होते हैं, उसी प्रकार प्राण, मन, बुद्धि, इन्द्रिय इनका ही विनाश होता है, आत्मा तो वृक्ष की तरह स्थित रहता क्योंकि वह नित्य है ।”
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प्राण तरुवर सुरति जड़, ब्रह्म भूमि ता माँहि ।
रस पीवे फूले-फले, दादू सूखे नाँहि ॥१२६॥
*ब्रह्म की और भी उपमा दी जा रही हैं -*
“परोपकार में सदा लगे रहने वाले सन्त ही वृक्षरूप हैं । उन सन्तरूपी वृक्षों की ब्रह्माकार वृत्ति ही मूल(जड़) है और ब्रह्म भूमि है । ब्रह्मभूमि में ब्रह्माकार वृत्ति से चिंतन रूप रस का पान करके प्रेमभक्ति रूप पुष्प और ज्ञानरूप फलों से संपन्न संत कभी काम-क्रोध आदि से निरस नहीं होते ।”
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ब्रह्म शून्य तहँ क्या रहै, आतम के अस्थान ।
काया अस्थली क्या बसै ? सद्गुरु कहैं सुजान ॥१२७ ॥
हे ज्ञानिन् ! हे सद्गुरो ! जीवन्मुक्त का क्या लक्षण है ? आत्मनिष्ठ और देहाध्यासी पुरुष के क्या लक्षण है ?
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काया के अस्थल रहैं, मन राजा पंच प्रधान ।
पच्चीस प्रकृति तीन गुण, आपा गर्व गुमान ॥१२८॥
लौकायतिक दार्शनिकों के मत में पृथ्वी आदि चार भूतों का समुदाय चेतन या स्थूल शरीर ही आत्मा है । इन के मत में शरीरातिरिक्त कोई आत्मा नहीं है; शरीरपोषण तथा शारीरिक सुखसाधन के पुरुषार्थ - ये दो ही पुरुषार्थ हैं । मोक्ष नहीं हैं, न लोकान्तर है, न जीव के अतिरिक कोई परमेश्वर है । उनके लक्षण बतला रहे हैं -
*काया के अस्थल रहे* अर्थात् देह को ही आत्मा मानने वालों के मत से इस काया नगर में मन का साम्राज्य है । जैसा मन कहता है वैसे ही ये करते हैं । ये बुद्धि से कर्तव्याकर्तव्य का भी विचार नहीं करते न धर्म-अधर्म का विचार करते हैं । शरीर का पालन ही इनके मत में मोक्ष है । पाँचों इन्द्रियाँ ही मन्त्री का कार्य करती हैं । अर्थात् राजा मन के अनुसार ही चलती हैं ।
पृथ्वी आदि पच्चीस प्रकृतियाँ ही इस कायानगर में रहने वाली प्रजा हैं । अस्थि, मेद, क्षुधा, रोध(रोकना), भय - ये पाँचों पृथ्वी की प्रकृति हैं । त्वक, मूत्र, तृषा, भर्म, मोह - ये पाँच जल की प्रकृति है । अग्नि की प्रकृति है माँस, रक्त, आलस्य, ऊर्ध्वगमन एवं क्रोध । नाड़ी, वीर्य, संगम, अतिनिर्गमन, तथा काम ये वायु की प्रकृति हैं । रोम, कफ, निद्रा, ऊर्ध्वगति तथा लोभ - ये पाँच आकाश की प्रकृति है ।
तथा सत्व, रज, तम - इन तीनों गुणों का अभिमान, विद्या, रूप, गुण का अभिमान; शारीरिक शक्ति का अभिमान - ये देहाध्यासी मानव के लक्षण हैं ।
(क्रमशः)

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