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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू दूजे अंतर होत है, जनि आने मन मांहि ।*
*तहाँ ले मन को राखिये, जहँ कुछ दूजा नांहि ॥*
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साभार ~ Soni Manoj
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*परमात्मा चैतन्य का, शक्ति का अरूप विस्तार है* 🌿
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परमात्मा को कल्याणकर कहने का अर्थ बिलकुल दूसरा है । उसका अर्थ यह है कि उसका स्वभाव, इस अस्तित्व का मौलिक स्वभाव मंगलदायी है । मंगल करता नहीं वह, आप उसके निकट जाएं, मंगल होना शुरू हो जाता है । यह उसका कृत्य नहीं है, यह उसका स्वभाव है ।
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जैसे मैं बगीचे की तरफ जाऊं, तो जैसे-जैसे पास पहुंचता हूं, ठंडी हवाएं आनी शुरु हो जाती हैं । बगीचा कोई ठंडी हवाएं भेजता नहीं है । और ऐसा भी नहीं है कि जब कोई नहीं निकलता बगीचे के पास, तो बगीचा अपनी ठंडी हवाएं रोक लेता हो । न, बगीचे को इससे प्रयोजन ही नहीं है । यह बगीचे का स्वभाव है कि उसके आसपास ठंडी हवा होगी ही । जब आप पास पहुंचते हैं, हवाओं की ठंडक बढ़ने लगती है । और पास पहुंचते हैं तो फूलों की सुगंध आने लगती है । यह भेजा नहीं जा रहा है । यह बगीचे के होने में ही निहित है । इसका मतलब हुआ कि बगीचा चाहे भी तो इससे अन्यथा नहीं कर सकता है । गरम हवा भेजना भी चाहे तो बगीचे के पास कोई उपाय नहीं है । और दुर्गंध भेजना भी चाहे तो बगीचे में ऐसे कोई फूल नहीं खिलते हैं ।
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परमात्मा मंगलदायी है । इसका अर्थ है कि जैसे-जैसे हम उसके निकट जाते हैं, हमें मंगल का अनुभव होता है । खयाल रखना, यह हमारा अनुभव है । यह हमारा अनुभव है कि परमात्मा मंगलदायी है । परमात्मा को इसका कोई भी पता नहीं है । अगर पता भी हो, तो पता तभी होता है जब विपरीत मौजूद हो । अगर आपको पता चलता है कि फलां व्यक्ति को मैं प्रेम करता हूं तो उसका मतलब ही यह है कि आपके भीतर घृणा मौजूद है । नहीं तो पता नहीं चलेगा । पता कैसे चलेगा ? अगर आप कहते हैं, फलां व्यक्ति को मैंने क्षमा कर दिया, उसका मतलब ही यह है कि क्रोध मौजूद है । नहीं तो क्षमा का पता कैसे चलेगा ? विपरीत के कारण ही पता चलता है ।
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परमात्मा को पता नहीं चलता कि वह मंगलदायी है । अगर उसे पता चल जाए तो वह गैर-मंगल भी कर सकता है । इसलिए परमात्मा को हम व्यक्ति की भाषा में सोचें ही न । क्योंकि जिसको कुछ भी पता नहीं चलता वह व्यक्ति नहीं है, सिर्फ शक्ति है । पता चलने के जोर से ही व्यक्ति निर्मित होता है । मुझे पता चलता है कि मैंने प्रेम किया, पता चलता है कि मैंने क्रोध किया, पता चलता है कि मैंने क्षमा की, यह पता जिस केंद्र को चलता है वही व्यक्ति बनता है । जब कोई पता नहीं चलता --- परमात्मा को कुछ भी पता नहीं चलता, इसका यह मतलब नहीं है कि वह अज्ञानी है । इसका कुल मतलब इतना है कि विपरीत उसके भीतर नहीं है । इसलिए सब होता है, लेकिन पता नहीं चलता । वह एक चैतन्य का विस्तार है । व्यक्ति नहीं एक चैतन्य । चैतन्य का, शक्ति का अरूप विस्तार है ।
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यह हमारा अनुभव है कि उसके पास जाते हैं तो मंगल होने लगता है, उससे दूर जाते हैं तो अमंगल होने लगता है । यह जो अमंगल होता है, वह उसके कारण नहीं होता है, हमारे दूर जाने के कारण होता है । यह जो मंगल होता है, यह भी उसके कारण नहीं होता है, हमारे पास जाने के कारण होता है । तो हम इसे ऐसा अच्छा होगा कहना कि परमात्मा के पास जाने की जो प्रतीति है, उसका नाम मंगल है और परमात्मा से दूर जाने की जो प्रतीति है, उसका नाम अमंगल है । यह हमारी प्रतीति है । अगर हम परमात्मा में पूरी तरह छलांग लगा लें तो हमें भी मंगल का पता नहीं चलेगा ।
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तो जिस दिन मंगल का भी पता न चले, उस दिन जानना कि उससे एकता सध गयी । जब तक मंगल का पता चलता रहे, तब तक जानना कि पास जा रहे हैं । मंगल बढ़ता जा रहा है, आनंद बढ़ता जा रहा है, शांति बढ़ती जा रही है, लेकिन पास जा रहे हैं । जिस दिन इनका भी पता न चले, उस दिन समझना कि छलांग लग गयी । उसमें ही हो गये ।
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इसलिए बुद्ध जैसे आदमी को हम कहते हैं, परम शांत । कहना नहीं चाहिए । अशांत भी वह नहीं हैं, अब शांत भी न रहे । क्योंकि शांति का अनुभव अशांत व्यक्ति को ही चलता है । बीच-बीच में अशांति आती रहे तो उन दोनों के बीच में जो वक्त मिलता है, उसको हम शांति कहते हैं । दो अशांतियों के बीच में शांति का अनुभव होता है । अगर एक अशांति के बाद फिर अशांति आए ही नहीं, तो थोड़े ही दिनों में शांति का अनुभव भी खो जाता है । शांत होता है व्यक्ति, लेकिन अनुभव नहीं रह जाता, अनुभोक्ता नहीं रह जाता ।
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🍁 ओशो 🌵
कैवल्य उपनिषद
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