मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*एक कहूँ तो दोइ हैं, दोइ कहूँ तो एक ।*
*यों दादू हैरान है, ज्यों है त्यों ही देख ॥*
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साभार ~ Atul Solanki

🌷🍀🌷 *कभी एक और एक मिलकर डेढ़ ही होगा* 🌷🍀🌷

शिवपुरी बाबा प्यारे आदमी थे। थोड़े-से आदमियों में इस सदी में, जिनके भीतर परमात्मा का वास था, एक थे।

वे कोई पैंतीस साल तक सारी दुनिया में यात्रा करते रहे–चुपचाप, एक अज्ञात आदमी की भांति ! उन यात्राओं में वे दुनिया के बड़े-बड़े लोगों से मिले। अलबर्ट आइंस्टीन से भी मिलना उनका हुआ। अलबर्ट आइंस्टीन से उनकी जो बात हुई, उसमें शिवपुरी बाबा ने कहा - “आप क्या सोचते हैं दो और दो चार होते हैं?” आइंस्टीन ने कहा - “निश्चित दो और दो चार होते हैं, इसमें भी क्या पूछने की बात है !”
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शिवपुरी बाबा ने कहाः “लेकिन मेरा एक निवेदन है, दो और दो चार नहीं हो सकते। एक और एक दो नहीं हो सकते, क्योंकि यहां दो चीजें एक जैसी हैं ही नहीं; जोड़ोगे कैसे? यहां दो “एक” एक जैसे हैं ही नहीं, प्रत्येक चीज इतनी अद्वितीय है ! एक और एक मिलकर दो हो सकते हैं, अगर एक और एक बिल्कुल एक जैसे हों। मगर कोई चीज एक जैसी नहीं है।”
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तुम कहते हो, एक आदमी कमरे में है, एक और आदमी आ गया तो दो आदमी हो गए। मगर ये दो आदमी इतने भिन्न हैं, इनको दोनों को एक-एक मानकर चलोगे, एक जैसा मानकर चलोगे? गणित में धोखा हो जाएगा। इसमें एक आदमी कृष्ण जैसा हो सकता है, एक आदमी कंस जैसा हो सकता है। दोनों भीतर जाएं तो दो नहीं होते। कृष्ण और कंस हों तो एक-दूसरे को काट देंगे। या इनमें कोई मजनू और लैला हो सकता है; ये दो भीतर जाएं तो दो जुड़कर एक हो जाएंगे, दो नहीं बचेंगे। निर्भर करेगा। सदा एक और एक दो नहीं होगा और सदा दो और दो चार नहीं होंगे। कभी एक और एक मिलकर डेढ़ ही होगा; कभी एक और एक मिलकर एक ही होगा; कभी एक और एक मिलकर दस भी हो सकते हैं। कठिन है कहना।
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कहते हैं आइंस्टीन चुप हो गया और सोचने लगा, बात तो सच थी। जिंदगी गणित से थोड़ी ज्यादा है। जिंदगी रहस्यपूर्ण है। गणित सारे रहस्यों को समाप्त कर देता है।

अजहूं चेत गंवार, प्रवचन # १६, ओशो

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