#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*जाके हिरदै जैसी होइगी, सो तैसी ले जाइ ।*
*दादू तू निर्दोष रह, नाम निरंतर गाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*आसै आसण का अंग ६४*
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देव सेव बहु मांड१ में, मंडी२ न मेटी जाँहि ।
रज्जब रूच सी प्राणिहिं, जाके जो मन माँहिं ॥३७॥
ब्रह्माण्ड१ में बहुत देवों की सेवा-भक्ति चलती है, और जो बनी२ है, वह मिटाई भी नहीं जा सकती है किन्तु जिसके मन में जो देव बसा उसी की सेवा उसे रुचि कर होती है ।
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जो दिल में सौदागरी१, दुनी४ सु सौदा२ होय ।
रज्जब बिच व्यापार बिन, बाहर विणज३ न कोय ॥३८॥
जो मन में व्यापार१ होता है, वही व्यापार२ बाहर संसार४ में होता है, यदि मन में व्यापार नहीं हो तो बाहर भी व्यापार३ नहीं होता है ।
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लक्षण लोक असंख्य कुल१, घटि घटि नगर बसंत ।
उभय एक अंग मिल रमहिं, जन रज्जब जग मंत२ ॥३९॥
शुभाशुभ लक्षण रूप असंख्य लोक हैं, उनमें मनोरथ रूप वंशों१ के नगर घड़ी घड़ी में बसते हैं, जगत के प्राणियों का यही उद्योग२ है कि लक्षण और मनोरथ दोनों को एक ही शरीर में मिलकर इच्छानुसार विचरते हैं ।
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जाति पांती सब को करै, सगों१ सगाई२ होय ।
त्यों सुकृत सुकृत मिले, कुकृत कुकृत जोय ॥४०॥
अपनी अपनी जाति पांति से सभी मेल करते हैं, संबन्धियों१ से ही संबन्ध२ होता है, वैसे ही सुकृत से सुकृत मिलते हैं और कुकृत से कुकृत मिलते हैं ।
(क्रमशः)

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