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*सब घट में गोविन्द है, संग रहै हरि पास ।*
*कस्तूँरी मृग में बसै, सूंघत डोलै घास ॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com
'समस्त जगत कल्पना मात्र है और आत्मा मुक्त और सनातन है, ऐसा जानकर धीरपुरुष बालकों की भांति क्या चेष्टा करता है !'
यह बड़ा अदभुत सूत्र है।
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समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्त: सनातन:।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
सारा जगत कल्पना मात्र है, ऐसा जिसने जाना, ऐसा जानते ही दूसरी बात भी जान ली साथ ही साथ, युगपत, कि आत्मा सनातन और मुक्त है। जब तक संसार सत्य है, आत्मा बंधन में मालूम होती है। जैसे ही संसार मालूम हुआ मिथ्या—आत्मा मुक्त है।
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संसार की भ्रांति ही बंधन है। बंधन वास्तविक नहीं है। मान रखा है कि बंधन है, इसलिए है। छोड़ दें मान्यता, छूट जाता है।
’ऐसा जान कर धीरपुरुष क्या बालकों की भांति चेष्टा करता है !'
बच्चे अभ्यास करते हैं। भाषा सीखनी है तो अभ्यास करना पड़ता है। भाषा छोड़नी हो तो भी क्या अभ्यास करना पड़ेगा? कुछ कमाना हो तो अभ्यास करना पड़ता है। कुछ गंवाना हो तो अभ्यास करना पड़ेगा?
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रामकृष्ण के पास एक आदमी ने पांच सौ मोहरें ला कर रख दीं, कहा कि आप को दान करना है। रामकृष्ण ने कहा : तू एक काम कर, दान तो हम ले लिये, हमने स्वीकार कर लिया; अब हमारी तरफ से इनको गंगा में फेंक आ। वह आदमी बड़ी मुश्किल में पड़ा।
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इंकार ही कर देते तो अपने घर तो ले जाता, यह और उपद्रव कर दिया। स्वीकार भी कर लिया और अब कहते हैं गंगा में फेंक आ। और अब कहते हैं मेरी तरफ से, इसलिए अब मेरा कोई वश भी नहीं है। वह गया। बड़ी देर लगा दी। तो रामकृष्ण ने कहा : पता लगाओ, गया कि नहीं गया ? कहां है ? कितनी देर लगा दी? इतनी देर की जरूरत क्या ?
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कोई गया तो देखा, उसने वहां भीड़ इकट्ठी कर रखी थी। वह एक—एक अशर्फी को पटकता सीढ़ी पर, बजाता, खनखनाता, फिर फेंकता और गिनती करता। तो देर लग रही थी।
रामकृष्ण भागे गये और कहा : पागल, जब कमाना हो तो गिनती करनी पड़ती है; जब फेंकना है तो गिनती किसलिए कर रहा है? यह खनखना किसलिए रहा है? अब तुझे क्या फिक्र पड़ी है कि सही है कि खोटी है, कि असली है कि नकली है। कमाते वक्त की तेरी आदत है।
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मगर गंवाने में? फेंक, इकट्ठा फेंक !
अभ्यास करना पड़ता है, जब कमाते हैं। भोग का अभ्यास करना पड़ता है, त्याग का अभ्यास नहीं करना पड़ता। त्याग तो एक क्षण में घट जाता है। भोग तो जन्मों—जन्मों में नहीं घटता और त्याग एक क्षण में घट जाता है। त्याग के लिए समय की जरूरत ही नहीं है। ज्ञान के लिए अभ्यास की जरूरत नहीं है, क्योंकि ज्ञान स्वभाव है। अभ्यास तो उसका करना पड़ता है जो स्वभाव नहीं है।

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